Saturday, 25 May 2019

जनादेश के 'मायने’ महानायक मोदी

देवानंद सिंह
जब कोई उम्मीदों पर खरा उतरता है तो उसका परिणाम लाजवाब होता है
लोकसभा चुनावों का परिणाम सामने आ चुका है। बीजेपी ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में फिर वापसी की है। महागठबंधन की नैया से स्वयं को पार लगाने की कोशिशों जुटे विपक्षियों का इस तरह सूपड़ा साफ हुआ कि उनके लिए न उगलते बन रहा है और न ही निगलते। इस बात पर कोई शक नहीं की है कि साल-2014 में मोदी लहर थी, लेकिन इस बार के परिणामों से साफ जाहिर होता है कि यह लहर ही नहीं, बल्कि सुनामी है, क्योंकि इस सुनामी के पीछे लोगों का विश्वास भी था। यह विश्वास काम के दम पर बना, जबकि 2014 में उम्मीद के पीछे एक विश्वास की किरण थी। दोनों में फर्क होता है, क्योंकि जब कोई उम्मीद पर खरा उतरता है तो उसका परिणाम और भी लाजवाब होता है। लोकसभा चुनावों का परिणाम इसी का नतीजा है।

वास्तव में, इस जनादेश के बड़े मायने हैं, जो पार्टियां परिवारवाद, भाई-भतीजावाद, जातिवाद को राजनीति में बढ़ावा दे रहे थ्ो, उनके लिए यह किसी सबक से कम नहीं है। यह परिवर्तन का दौर है। यहां अब पूर्ववतीã सोच नहीं चलेगी, बल्कि यहां परिवर्तनकारी और विकास के मॉडल को आगे बढ़ाने की सोच की जरूरत है। आजादी के कई दशकों के बाद भी अगर, देश में भूखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी आदि आज भी बरकरार है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है। अगर, पूर्व में रही सरकारें इस तरफ ध्यान देती तो निश्चित ही देश की तस्वीर अलग होती।
दूसरा, क्षेत्रीय पार्टियों ने जिस तरह राजनीति का मॉडल परिवारवाद और जातिवाद के आधार पर तैयार किया, उससे समाज के बीच और भी गहराई बढ़ती गई। ऐसी परिस्थितियों में उस गहराई को पटाने की जरूरत थी। आम आदमी को भी ऊंचे पायदान की तरफ ले जाने की सोच की जरूरत थी। लिहाजा, पिछले पांच वर्ष के दौरान मोदी के नेतृत्व में इस क्षेत्र में व्यापक काम किया गया। लोगों ने इसे देखा और महसूस भी किया। नतीजन फिर से मोदी के प्रति बड़ा जनादेश सामने आया है।
विपक्षियों की बात करें तो उनके पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं था, जिसके आधार पर जनादेश में परिवर्तन देखने को मिलता। उन्होंने मोदी-शाह हटाओ के नारे के साथ स्वयं को मजबूत नहीं, बल्कि बीजेपी की जीत में ही भूमिका निभाई। अपने सैद्धांतिक विचारों को तिलांजलि देकर देश की अधिकांश पार्टियां जिस प्रकार मोदी के खिलाफ एक मंच पर आईं, उससे लोगों के बीच रोष था, क्योंकि उनके पास जनता से संबंधित कोई भी मुद्दे नहीं थे
अगर, मुद्दे होते तो शायद इसका परिणाम थोड़ा-बहुत तो अलग होता ही। यहां साफ हो गया है अब देश में विभाजनकारी सोच के लिए कोई जगह नहीं है। लिहाजा, मोदी की सुनामी के बाद अपने अस्तित्व को संकट में डालने वाली पार्टियों को गहन सोच-विचार करने की जरूरत है। वंशवाद के खिलाफ आए नतीजों ने जहां एक तरफ बड़े-बड़े नेताओं व उनके परिवारों को उखाड़ फेंका, वहीं, एक विकास रूपी सोच को पिरोने का रास्ता भी प्रशस्त किया। पिछली बार से भी बड़ी जीत का दावा करते रहे मोदी ने न सिर्फ यह साबित किया है, बल्कि यह भी जता दिया है कि भविष्य की राजनीति सिर्फ खोखले नारों पर हो ही नहीं सकती है। अब विश्वास की जमीन पर ही नारे भी चलेंगे और वोट भी पड़ेंगे। व्यक्गित आरोप-प्रत्यारोप भी सिर्फ उसी की सुनी जाएगी जो भरोसे और विश्वास के तराजू पर फिट बैठता हो। यह भरोसा सिर्फ नारों से नहीं जीता जा सकता है, बल्कि उसके लिए आम लोगों से कनेक्ट तो होना ही पड़ता है, बल्कि उसके अनुरूप काम भी करना पड़ता है। जो सिर्फ अपनों को बढ़ाने की बात करेगा, अब उसका जमाना गया, बल्कि यहां देश की बात करनी पड़ेगी। देश की सुरक्षा की बात करनी पड़ेगी। विकास के नए मॉडल की बात करनी पड़ेगी। तभी देश की जनता भी उसके साथ खड़ी नजर आएगी। देश की जनता बहुत जागरूक है। यह युवाओं का देश है। युवा भली-भांति जानते हैं कि देश का हित किसके हाथ में सुरक्षित है। इसीलिए चालबाजी से काम नहीं चलेगा, बल्कि काम करना पड़ेगा। जब तक जीत का सार्थक मंत्र जनता के सामने पेश नहीं किया जाएगा, तब तक जीत असंभव है। मोदी ने जनता को जीत का मंत्र देने में विपक्षियों को कहीं पीछे छोड़ दिया। विपक्षी मोदी-शाह हटाओ के नारे देते रहे, लेकिन मोदी जीत के मंत्र के साथ लोगों के बीच गए। उन्होंने मजबूत और निर्णायक नेतृत्व का भरोसा दिया। पिछले पांच साल के कार्यकाल में इसे खुले तौर पर देखने को भी मिला। इसी का नतीजा रहा कि लोगों ने भी मोदी के उस भरोसे को कायम रखा।
जो दिग्गज इस शिगूफे में थे
कि वे जमघट बनाकर मोदी को पटखनी देंगे, वे ही हर तरफ धराशाही हो गए। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर-प्रदेश को ही ले लेते हैं। सपा-बसपा की गोलबंदी कोई काम नहीं आई। दोनों पार्टियां चारों खाने चित्त हो गईं। चंद्रबाबू नायडु, ममता बनर्जी का बुरा हाल तो हुआ ही बल्कि परिवारवाद की नाव में सवार कई और दिग्गज भी पानी मांगने के लायक नहीं रहे।
झारखंड का हाल इन सब से अलग नहीं रहा मुख्यमंत्री रघुवर दास अपने काम की बदौलत साथ में मोदी के नाम पर जनता से वोट मांगा और पूरे झारखंड में 2014 की स्थिति को बरकरार रखने के साथ-साथ संथाल में अपनी रणनीति में सफल भी रहे हालाकि प्रदेश अध्यक्ष की सीट बचाने में वे नाकामयाब रहे कारण स्पष्ट था जनता उनसे नाराज चल रही थी प्रदेश अध्यक्ष को अपने हाई-फाई साथी का नुकसान उठाना पड़ा
वही झारखंड के छात्रों को राज्य की जनता ने सबक सिखाने का काम भी किया तथा यह संदेश भी दिया की खोखले वादे पर जनता नहीं विश्वास करती जबकि दुनिया में स्वयं को सबसेअधिक ईमानदार नेता बताने वाले अरविंद केजरीवाल का वह हाल हुआ कि वह दिल्ली वालों को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहा। शायद, इन पार्टियों के पास मुद्दे होते, जनता के प्रति नेक इरादे होते तो शायद कुछ और संघर्ष करते, लेकिन उन्होंने पूरे छलावे के साथ चुनाव मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसी का नतीजा रहा है कि लोगों का भरोसा मोदी के प्रति उभरा। इसीलिए इस जनादेश के मायने अपने-आप में बढ़ जाते हैं और मोदी जी की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है कि वह आगामी पांच सालों राष्ट्र के विकास में वह भूमिका निभाएं जिससे लोगों का विश्वास उनके प्रति और भी गहरा और प्रगाढ़ होता जाए

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