Friday, 27 September 2019

खतरे में है ब्रह्मर्षि विकास मंच जमशेदपुर का अस्तित्व भाग 02

खतरे में है ब्रह्मर्षि विकास मंच जमशेदपुर का अस्तित्व
देवानंद सिंह

समाज को एक करने के लिए त्याग की जरूरत
वोट और कुर्सी की ही राजनीति करने के लिए आज के परिदृश्य में अधिकतर नेताओं ने सफल होने के लिए समाज को बांटना एवं उसमें विद्वेष फैलाना आवश्यक मान लिया है कम से कम ब्रह्मर्षि विकास मंच जमशेदपुर का तो यह मूल मंत्र बन चुका है देश के लगभग सभी राजनीतिक दलों ने ब्रह्मर्षि समाज को हाशिए पर रखा लोकसभा चुनाव के दौरान .अब जबकि विधानसभा चुनाव कई राज्यों में होने हैं झारखंड भी इसमें शामिल है बिहार के साथ-साथ झारखंड के ब्रह्मर्षियों में भी स्वाभिमान जागृत हुआ है बिहार में नवंबर में अधिवेशन है तो झारखंड में अक्टूबर में ऐसे में झारखंड की औद्योगिक राजधानी जमशेदपुर में इसकी गुनगुनाहट ना हो यह संभव हो नहीं सकता


पिछले कई दशक से ब्रह्मर्षि समाज जमशेदपुर की पहचान जातीय संगठन के रूप में नहीं बल्कि मानवीय संगठन के रूप में जमशेदपुर के मानचित्र पर उभर कर सामने आया था परंतु ब्रह्मर्षि विकास मंच के संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय के के सिंह के अस्वस्थ होने के बाद एक बैठक कर सर्वसम्मति से पूर्व पुलिस उपाधीक्षक चंद्र माधव सिंह को अध्यक्ष बनाया गया था चंद्र माधव सिंह उस समय शहर में मौजूद नहीं थे शहर आगमन के समय जिस तरह से उनका जोरदार स्वागत हुआ वह इतिहास बना .वे अपना कार्यकाल भी अच्छी तरह से पूरा कर बेदाग निकलने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे अपने कार्यकाल के खत्म होने से पूर्व उन्होंने
जमशेदपुर ब्रह्मर्षि विकास मंच के गठन के लिए एक चुनाव संचालन समिति का गठन किया जिसकी सहमति आमसभा में उन्होनें लिया था

संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय केके सिंह ने कमेटी के गठन के दौरान ही यह स्पष्ट रूप से कह दिया था की सामाजिक संगठन में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होगा हम एक दूसरे के पूरक हैं जहां समाज को राजनीतिक लोगों का दरकार होगा हम उनसे मदद लेंगे और जब राजनीतिक दलों के नेताओं को समाज की दरकार होगी तो समाज पहली पंक्ति में खड़ा रहेगा परंतु ब्रह्मर्षि विकास मंच के गठन के किसी भी प्रक्रिया में राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होगा और आजीवन उसे उन्होंने निभाया भी .राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान सभी राजनीतिक दलों के नेताओं को मंच पर स्थान देकर राष्ट्रीय सामाजिक राजनीति में लंबी लकीर उन्होंने खींची थी जिसकी चर्चा पूरे देश में हुई थी जमशेदपुर के अखबारों की लगातार 8 दिनों तक सुर्ख़ियों में रहा था ब्रह्मर्षि विकास मंच का राष्ट्रीय अधिवेशन
  कैसे बटा समाज दो भाग में
चंद्र माधव सिंह ने अपना कार्यकाल पूरा होने के पूर्व
न्यू डीएस सामुदायिक भवन केबुल टाउन में एक बैठक बुलाकर कमेटी के गठन के लिए सभी सदस्यों से राय मांगे जबकि उसी बैठक में महासचिव सुधीर सिंह वर्तमान कमेटी के दूसरे कार्यकाल के लिए विस्तार की मांग कर रहे थे जिसका लोगों ने पुरजोर विरोध किया था इसके पीछे कारण था सांसद फंड से लिए गए पैसे को छुपाना सदस्यों का गुस्सा सातवें आसमान पर था सदस्यों का सीधा मांग था चुनाव इसके लिए बैठक में सर्वसम्मति से लोगों ने
यह निर्णय लिया कि अध्यक्ष अपने मन से 11 लोगों की एक कमेटी चुनाव संचालन समिति बनाकर चुनाव कराएं उन्होंने संचालन समिति बनाया भी परंतु अध्यक्ष चंद्र माधव सिंह ने किसी भी क्षेत्रीय कमेटी के पदाधिकारियों को अपने विश्वास में नहीं लिया जबकि सभी क्षेत्रीय पदाधिकारी उन्हीं के कार्यकाल में बनाए गए थे चूक यही हुई कि सभी संचालन समिति के सदस्य विभिन्न राजनीतिक दल से थे लोगों का कहना है कि पूर्व महासचिव के प्रभाव में आकर अध्यक्ष चंद्र माधव सिंह ने ऐसा किया हालांकि चंद्र माधव सिंह ने सूची बनाकर प्रभावशाली लोगों के पास इस सूची को भेजा भी था लेकिन समय पर किसी ने उसका जवाब नहीं दिया तो उन्होंने इसकी घोषणा अखबारों के माध्यम से जमशेदपुर में कर दी जिसका परिणाम हुआ कि लोगों ने खुलेआम यह कहना शुरू किया कि पूर्व महासचिव सुधीर सिंह की महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए इन्होंने इस कमिटी की घोषणा की है इसी बीच चुनाव संचालन समिति के कुछ सदस्य अपना काम करना चालू कर दिया जबकि कुछ सदस्य विवाद को देखते हुए कमेटी से अपने आप को दूर कर लिया
उससे पूर्व कमेटी की घोषणा में हुए देर के कारण एवं चर्चाओं के आधार पर की एक व्यक्ति विशेष को अध्यक्ष बनाने के लिए इस तरह की कमेटी की घोषणा की गई हैआनन-फानन में होटल क्रिस्टल में प्रोफेसर रामाशीष चौधरी की अध्यक्षता में एक बैठक हुई इस बैठक के आयोजन में वर्तमान प्रवक्ता उमानाथ सिंह उर्फ चुलबुल की महत्वपूर्ण भूमिका बतायी जाती है बैठक में विकास सिंह का नाम आगे कर दिया दूसरी तरफ संचालन समिति में शामिल भाजपा नेता रामनारायण शर्मा ने राम प्रकाश पांडे का नाम आगे कर दिया इसके बाद राजनीतिक दलों के नेताओं ने चक्रव्यूह की रचना ऐसी रची के सामाजिक ताना-बाना ही समाज का खत्म हो गया और अध्यक्ष चंद्रमाधव सिंह के हाथ से सब कुछ तब तक निकल चुका था
जिसका परिणाम हुआ की समाज दो खेमे में बटा कुछ इधर के हुए कुछ उधर के हुए एक गुट राम प्रकाश पांडे का बना तो दूसरा गुट विकास सिंह का बना और दोनों तरफ से दो चार लोग ऐसे जमा हुए जिन्होंने आग में घी डालने का काम किया
कल पढ़े समाज को बांटने ….

जारी

जमशेदपुर के गौरवशाली ब्रह्मर्षियों के इतिहास को धूमिल करने की साजिश भाग 01

जमशेदपुर के गौरवशाली ब्रह्मर्षियों के इतिहास को धूमिल करने की साजिश ?

संस्था एक अध्यक्ष दो दोषी कौन?

देवानंद सिंह

लुटे सियासत की मंडी में और झूठी रुसवाई में
जाने कितना वक़्त लगेगा रिश्तों की तुरपाई में
ब्रह्मर्षि समाज का पूरे देश के साथ-साथ जमशेदपुर का इतिहास जितना गौरवशाली है उतना भविष्य सोचनीय, कभी बिहार की राजनीतिक दिशा और दशा तय करने वाला समाज वर्तमान में अपने गौरवशाली अतीत की ओर लौटने के लिए जीत और कोशिश में जुटा है वही कुछ राजनीति के मजे हुए खिलाड़ी या यह कह सकते हैं कि राजनीति के सौदागर एक गहरी साजिश के तहत समाज को चौराहे पर लाने का प्रयास कर रहे हैं हम जमशेदपुर के बात करें तो ब्रह्मर्षि विकास मंच के संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय कौशल किशोर सिंह ने शिक्षित अनुशासित और कर्मठ लोगों की टीम बनाकर समाज के रुतबे और प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाया था आज वही ब्रह्मर्षि विकास मंच जमशेदपुर के कुछ महत्वाकांक्षी लोगों के कारण समाज दो भागों में बट गया है

ब्रह्मर्षि विकास मंच जमशेदपुर को इस तरह चौराहे पर खड़ा करने में तत्कालीन अध्यक्ष के साथ-साथ कुछ राजनीतिक लोगों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है पूर्व में हुए राजधानी के महासम्मेलन की कड़वाहट को उन्होंने समाज को टुकड़ों में बांटकर अपनी भड़ास निकालने का काम किया है ब्रह्मर्षि विकास मंच जमशेदपुर के एक समूह ने इन 2 वर्षों में ऐसे दर्जनों काम किए हैं जिनके चलते समाज के बुद्धिजीवियों के जुबान पर ब्रह्मर्षि विकास मंच का नाम आ चुका है अब समाज के तटस्थ लोगों के जुबान पर यह बात आने लगी है कि समाज को बांटने वाले लोगों ने जो प्रक्रिया अपनाई थी वह प्रक्रिया ही गलत थी राजनीति करने वाले लोगों के हाथों में गठन की प्रक्रिया एक साजिश के तहत दिया गया था समाज के चारों तरफ से यह आवाज आने लगी है कि पूर्व अध्यक्ष की अदूरदर्शिता और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के कारण जिस ब्रह्मर्षि विकास मंच का पूरे देश में नाम था उसे धूमिल करने का काम जमशेदपुर के सात लोगों ने किया है
गौरवशाली ब्रह्मर्षियों के इतिहास को धूमिल करनेवालों की हो पहचान
संस्थापक अध्यक्ष स्वर्गीय के के सिंह ने शिक्षित अनुशासित और कर्मठ लोगों की टीम बनाकर समाज के रूतवे और प्रतिष्ठा को आगे बढ़ाया था उस रूतवे और प्रतिष्ठा को किसने किया धूमिल?समाज को बांटने का काम किसने किया?
जब एक अध्यक्ष पूरी टीम के साथ समाज हित में त्याग को तैयार तो दूसरा मौन क्यों?
संस्था का नाम एक अध्यक्ष दो क्यों?
पहले हम होगें एक फिर बात करेंगें रैली का
अब जबकि एक बार फिर झारखंड की राजधानी रांची में अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा को पूरा करने के लिए एक महासम्मेलन का आयोजन किया है ऐसे में जमशेदपुर के ब्रह्मर्षि घर में आग लगाकर राजधानी में दिवाली मनायेगें? जमशेदपुर के ब्रह्मर्षि समाज की प्रतिष्ठा को दांव पर लगाने का अधिकार किसी को नहीं ?व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए समाज की प्रतिष्ठा गांव पर नहीं लगाएं!
जारी…………

Monday, 16 September 2019

पाक हुक्मरानों की बौखलाहट

देवानंद सिंह 
जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत के हालिया संविधान संशोधन से पाकिस्तान के हुक्मरानों में बौखलाहट अंतिम स्तर तक पहुंच चुकी है। राज्य के पुनर्गठन और अनुच्छेद 370 को खत्म करने के भारत के फैसले के जवाब में पाकिस्तान सरकार ने कई इकतरफा घोषणाएं कर दी थीं। उसने भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को निलंबित कर दिया था और राजनयिक संबंधों का स्तर घटा दिया था। अपने हवाई क्षेत्र के कुल नौ में से तीन कॉरिडोर भी उसने भारतीय नागरिक उड़ानों के लिए बंद कर दिए थे। जम्मू-कश्मीर मसले को वह एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र में ले जाना चाहता है। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने तो यहां तक कह दिया है कि इस फैसले की वजह से भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हो सकता है। वह भी परमाणु युद्ध। इससे साफ जाहिर होता है कि पाकिस्तान की बौखलाहट किस चरम पर पहुंच चुकी है।


पाक एक तरफ शांति-शांति का राग अलापता है, दूसरी तरफ आंतकवाद को बढ़ावा तो देता ही और बात-बात पर परमाणु हमले की धमकी देता है। इस तरह की धमकी से पाकिस्तान क्या जताना चाहता है, इसको समझना भी बहुत अधिक मुश्किल नहीं है। इसीलिए पाकिस्तान की इस तरह की धमकियों का कोई मतलब नहीं है। खराब आर्थिक हालत के दौर से गुजर रहे पाक के लिए युद्ध से गुजरना तो दूर इसके बारे में सोचना भी बुरे स्वप्न जैसा है। पाकिस्तान पहले ही बदहाली के दौर से गुजर रहा है, अगर, वह युद्ध के दौर से गुजरता है तो उस पर क्या बीतेगी, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। भारत अपने एक राज्य के प्रशासन को लेकर क्या फैसला करता है, यह उसका आंतरिक मामला है। इस पर पाकिस्तान की इतनी तीखी प्रतिक्रिया समझ से परे है। पाक अधिकृत कश्मीर में वह किस तरह से शासन चला रहा है, इस पर भारत कहां कुछ कहता है? जब-जब वहां आतंकी गतिविधियां बढ़ती हैं तो उसकी निंदा जरूर की जाती है, जो खुद पाकिस्तान के लिए भी कम सिरदर्दी नहीं है। अभी जो कदम पाकिस्तान ने खीझ में उठाए हैं, और वह बात-बात में भारत को परमाणु हमले की धमकी दे रहा है, वह उसके लिए भी घातक हैं।
भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार संबंधों को निलंबित करने का ज्यादा नुकसान उसी का हो रहा है। इसका कारण यह है कि पाकिस्तान कई जरूरी चीजों का आयात भारत से करता है। पुलवामा आतंकी हमले के बाद व्यापार संबंधों में तनाव के चलते भारत से पाकिस्तान को होने वाले निर्यात में पहले ही कमी आई हुई है। इस मामले में भारत उस पर ज्यादा निर्भर नहीं है। इसी तरह हवाई क्षेत्र के कुछ कॉरिडोर को बंद करने से उड़ानों को 12 मिनट का अतिरिक्त समय लगेगा। इससे भारत को कितना नुकसान होगा? इस चीज को पाकिस्तान को समझ लेना चाहिए।
भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को कम करने का ही नतीजा है कि पाकिस्तान में जरूरी दैनिक चीजों के दाम आसमान छू रहे हैं। सब्जियों के दाम भारत के मुकाबले कई गुना ज्यादा हैं। ठमाठर 300 रुपए किलो तक पहुंच चुका है। पेट्रोल-डीजल के दाम भी भारत के मुकाबले बहुत ज्यादा हैं। सोना करीब एक लाख रुपए प्रति तोले पर पहुंच चुका है। पाक सरकार के पास सचिवालय का बिजली का बकाया बिल भरने का पैसा नहीं है। ऐसे में, अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुफ्त में बिलबिलाने से कुछ नहीं होगा। कश्मीर भारत का आंतरिक मामला है, उस पर पाक को न तो चिंता करने की जरूरत है और न ही दुनिया के हर चौखट पर कश्मीर का राग अलापने की जरूरत है। इस बात को दुनिया भी जानती है, तभी तो दुनिया के अन्य देशों ने साफ तौर पर कह दिया है कि यह भारत का आंतरिक मामला है। लिहाजा, इस पर उनका हस्तक्षेप उचित नहीं है। इन परिस्थितियों में पाकिस्तान को भी समझ लेना चाहिए और अपनी आंतरिक समस्याओं को दूर करने की तरफ ध्यान लगाना चाहिए।
पाकिस्तान कई बड़ी समस्याओं से जूझ रहा है। विकास के मामले में वह भारत से बहुत पीछे है, उस पर सैकड़ों अरब अमेरिकी डॉलर का कर्ज है। यह समय के साथ-साथ बढ़ता जा रहा है। पाक सरकार और वहां के मंत्रियों को इस बात की चिंता करनी चाहिए। हमले की धमकी व भारत के खिलाफ अर्नगल विवादों को खड़ा करने में समय खराब नहीं करना चाहिए। उसे अगर, दुनिया के साथ कदम-से-कदम मिलाकर चलना है तो उसे आंतकवाद का साथ छोड़ना होगा और भारत के खिलाफ बात-बात पर लड़ाई की बात करने की मनोदशा से भी तौबा करना होगा। पाकिस्तान के सामने चुनौती बहुत बड़ी है। यह चुनौती इसीलिए भी बढ़ती गई, क्योंकि उसने बेकार की चीजों में वक्त जाया किया है। हमेशा भारत के खिलाफ छद्धम युद्ध छेड़ता रहा है, जबकि भारत दूसरे मोर्चों पर स्वयं को मजबूत करने में जुटा रहा। ऐसे में, भारत और पाकिस्तान के बीच लंबा फासला है। भारत को छूने के लिए उसे कड़ी मेहनत की जरूरत है। ऐसे में, उसके लिए यही जरूरी है कि अर्नगल विवादों को खड़ा न कर वह अपनी आंतरिक समस्याओं पर ध्यान लगाए।

Saturday, 14 September 2019

पीएम ने एक तीर से साधे कई निशाने

पीएम ने एक तीर से साधे कई निशाने  
  आगामी विधानसभा चुनावों के मध्येनजर झारखंड बीजेपी के लिए कितना महत्वपूर्ण है, पीएम मोदी के दौरे से भी यह बात साफ हो गई है। पीएम ने राज्य में जिस तरह से दोबारा डबल इंजन की सरकार बनाने की बात कही,
उससे साफ जाहिर होता है कि वह झारखंड को आने वाले विधानसभा चुनावों के मध्येनजर कितना अहम मान रहे हैं। झारखंड सरकार ने पिछले पांच साल के कार्यकाल में जिस तरह से आम लोगों के लिए योजनाओं की घोषणा की और उनके संचालन में गंभीरता दिखाई है, उसे भी बीजेपी अचूक मंत्र के रूप में इस्तेमाल करने का पक्का मन बना चुकी है। लिहाजा, पीएम मोदी ने झारखंड के दौरे के दौरान एक तीर से कई निशाने साधे। विभिन्न योजनाओं के सफल संचालन में जहां सूबे के मुख्यमंत्री रघुवर दास की जमकर तारीफ की, वहीं केंद्र सरकार के कार्यों का भी खुलकर बखान किया। उन्होंने मुख्यमंत्री की तारीफ में कहा कि सूबे में विकास के जितने भी कार्य हो रहे हैं, उनमें उनके मित्र व झारखंड के मुख्यमंत्री का महत्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने कहा कि इससे पहले झारखंड घोटालों के राज्य के रूप में जाना जाता था, लेकिन अब परिस्थितियां बदली हैं। राज्य विकास के मामलों में देश के कई राज्यों से आगे है। ऐसे में, पीएम का साफ संकेत इस बात को स्पष्ट करता है कि बीजेपी आगामी विधानसभा चुनावों में राज्य के विकास को खूब भुनाएगी।  अगर, विकास की रथ यात्रा में शामिल करने की बात करें तो वह युवाओं, किसानों और आदिवासियों की बात करना नहीं भूले। जहां उन्होंने नए विधानसभा भवन को एक पवित्र स्थान बताया वहीं, युवाओं का एक बार जरूर विधानसभा भवन देखने का आह्वान भी किया। किसानों को लेकर भी पीएम ने कई तथ्य सामने रखे, जिसमें उन्होंने किसान पेंशन योजना के संबंध में कहा कि इस योजना के तहत 6.5 करोड़ किसानों के खाते में 21 हजार करोड़ की राशि जमा हो चुकी है, जबकि झारखंड में 8 लाख किसानों के खाते में 250 करोड़ रुपए जमा हो चुके हैं। आदिवासियों के संबंध में पीएम ने कहा कि केंद्र व राज्य की सरकारें आदिवासियों की सेहत, इलाज, पेंशन, सुरक्षा, पढ़ाई आदि हर क्षेत्र में मदद कर रही है। आदिवासी छात्रों की शिक्षा को सुधारने के लिए 462 मॉडल एकलव्य विद्यालयों की नींव रखी जा रही है। केंद्र सरकार एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय के हर आदिवासी छात्र को एक लाख रुपए से अधिक देगी। वहीं, हाईवे के निर्माण के संबंध में पीएम ने कहा कि 9 हजार करोड़ से अधिक की परियोजनाओं का काम चल रहा है। भारत माला के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग को निरंतर विस्तार दिया जा रहा है।
    केंद्र सरकार के दूसरे कार्यकाल के तहत भी सरकार के 100 पूरे होने के संबंध में पीएम ने कहा कि 100 दिन में तो ट्रेलर दिखा है, जबकि फिल्म दिखना अभी बाकी है। उन्होंने इस दौरान तीन तलाक, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने से लेकर आंतकवाद निरोधक कानून को निर्णायक बनाए जाने के संबंध में भी खुलकर अपनी बात रखी। कुल मिलाकर पीएम मोदी का झारखंड दौरा एक तरह से सामान्य दौरा नहीं, बल्कि आगामी विधानसभा चुनावों का पूरा खाका था, जिसमें जनता की टोह लेने के साथ-साथ उन्हें विकास की यात्रा में शामिल बनाए रखने की दृढ़ इच्छा शक्ति भी प्रबल रूप से दिखाई दी, क्योंकि इस दौर में जिस प्रकार विकास की जरूरत है, उसी रूप में आम आदमी के स्तर को भी उठाने की सख्त जरूरत है। केंद्र के साथ-साथ राज्य सरकार की योजनाओं में यह बात साफ तौर पर झलकती है। इसी खासियत को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य सरकार किसी भी तरह की कोताही नहीं बरतना चाहती है। पीएम का डबल इंजन की सरकार बनाने का संदेश साफ था कि अगर, राज्य में दोबारा बीजेपी की सरकार बनती है तो राज्य में विकास की जो गति है, उसमें किसी भी तरह का ब्रेक नहीं लगेगा, क्यों‌कि केंद्र में भी बीजेपी की ही सरकार है। केंद्र सरकार राज्य सरकार को पूरा समर्थन देगी और राज्य में संचालित योजनाओं को गति देने में उसकी पूरी मदद करेगी।
  असल में, बीजेपी की चुनाव मशीनरी झारखंड राज्य में पूरी तरह सक्रिय है और पार्टी ने हर हाल में 65 प्लस का लक्ष्य भेदने का मन बनाया है। इसके लिए बीजेपी ने एक किस्म की नई राजनीति को भी जमीन पर उतारा है, जिसके तहत जनता को पार्टी से जोड़ा ही जा रहा है, बल्कि विपक्षियों में भी सेंध लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है। अब तक देखा जाता रहा है कि राजनीतिक दल अपना घर मतबूत करने में जुटते रहे हैं, लेकिन बीजेपी ने इस बार विरोधियों को भी कमजोर  करने पर खासा ध्यान लगा रखा है। इसके अतिरिक्त अपने घर को मजबूत बनाए रखने के तहत पार्टी ने राज्य में 25 लाख नए सदस्य बनाने का अभियान चला रखा है, जिसका असर आगामी चुनावी रण में निश्चित ही देखने को मिलेगा।

Monday, 9 September 2019

स्पेस सुपरपावर बनने का हौसला

स्पेस सुपरपावर बनने का हौंसला
देवानंद सिंह
चंद्रमा के दक्षिणी धुर्व पर जहां आज तक कोई देश नहीं पहुंच पाया है, वहां रोवर को सॉफ्ट लैंड कराने का भारत का ऐतिहासिक मिशन भले पूरा नहीं हुआ हो, लेकिन इसने इसरो की इंजीनियरिंग दिलेरी और भारत के स्पेस सुपरपावर बनने की महत्वाकांक्षा को दो टूक बयां किया है। 

पूरी दुनिया जानती है कि चंद्रयान-2 भारत का सबसे महत्वाकांक्षी स्पेस मिशन था। विक्रम लैंडर और जिस प्रज्ञान रोवर को चांद की सतह पर उतारने के लिए वह ले जा रहा था, उनसे संपर्क टूटना भारत के स्पेस प्रोग्राम के लिए झटका जरूर है, लेकिन मिशन के लिए सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। इसने महत्वाकांक्षा के साथ-साथ उत्सुकता को और बढ़ा दिया है।
भारत भले ही अपने पहले प्रयास में लैंडिग नहीं कर पाया, लेकिन उसकी कोशिश बताती है कि उसके पास किस हद तक इंजीनियरिंग के क्षेत्र में शौर्य और दिलेरी है और दशकों में उसने वैश्विक महत्वाकांक्षा के साथ अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कितनी तरक्की की है। चंद्रयान-टू मिशन पूरी तरह से नहीं, बल्कि आंशिक तौर पर ही असफल माना जाएगा, क्योंकि ऑर्बिटर अब भी काम कर रहा है। इस आंशिक असफलता से मायूसी जरूर हुई है और चांद की सतह पर उतरने वाले देशों की प्रतिष्ठित कतार में शामिल होने की भारत की कोशिश में देरी होगी, लेकिन यह आने वाले वर्षों में भारत को चांद पर पहुंचने के प्रयासों को और बल देगा और सफलता निश्चित ही भारत के कदमों में होगी।
असल में, भारत उस दिशा में जा रहा है, जहां शायद भविष्य में चांद पर मानव बस्तियां बसने में 20 साल, 50 साल या 100 साल लगेंगे। लिहाजा, भारत का यह मिशन अत्यंत राष्ट्रीय गौरव का स्रोत तो है ही, बल्कि यह देश की युवा आबादी की आकांक्षाओं का निश्चित ही प्रतिबिब भी है। चंद्रयान-2 पर 14.1 करोड़ डॉलर (करीब 900 करोड़ रुपए) का खर्च आया, जो अमेरिका के ऐतिहासिक अपोलो मून मिशन की लागत का महज एक छोटा-सा हिस्सा है। भारत ने अपने पहले चंद्र मिशन के रूप में पहली बार 2008 में चंद्रयान-वन लांच किया था। संस्कृत व हिदी के शब्दों से जोड़कर इस मिशन का नामकरण किया गया था, जिसमें चंद्र का अर्थ चंद्रमा और यान का अर्थ वाहन है। भारत के पहले चंद्रयान मिशन की नींव 386 करोड़ रुपए के साथ रखी गई थी। यह मिशन काफी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसने देश को भविष्य में होने वाले अंतरिक्ष मिशनों के लिए तकनीकी व बुनियादी ढांचा प्रदान किया। दुनिया जानती है कि उपग्रहों से संचार स्थापित करना बहुत मुश्किल काम है। चंद्रमा, पृथ्वी से तीन लाख 86 हजार किमी. की दूरी पर परिक्रमा करता है, जो कि संचार उपग्रहों की कक्षा से 10गुना अधिक दूरी है। परिणामस्वरूप, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने संकेतों को प्राप्त करने और संचारित करने के लिए कहीं अधिक उन्नत सेंसर विकसित किए हैं।
उस वक्त, इसरो के ट्रैकिग अधिकारियों को अंतरिक्ष यान दिखाई नहीं दे रहा था, लेकिन आखिरकार चंद्रयान-वन को देखे बिना ही यह प्रयोग सफलतापूर्वक किया गया। मंगल मिशन के दौरान इस अनुभव ने व्ौज्ञानिकों की मदद की। 22 अक्टूबर, 2008 को 1,380किग्रा. वजनी चंद्रयान-वन अंतरिक्ष यान को भारतीय रॉकेट पोलर सैटेलाइट लॉन्च वीइकल (पीएसएलवी) द्बारा सफलतापूर्वक चंद्रमा की कक्षा में भेजा गया था। अंतरिक्ष यान ने चंद्रमा के चारों ओर 3,400 से अधिक परिक्रमाएं कीं। यह 29 अगस्त, 2009 तक 312 दिनों तक चालू अवस्था में था। इसके बाद इसके स्टार सेंसर गर्मी की वजह से क्षतिग्रस्त हो गए थे। इस अभियान के साथ भारत चंद्रमा की कक्षा में पहुंचने वाला दुनिया का चौथा देश बन गया था। चंद्रयान-वन ने निर्णायक तौर पर चंद्रमा पर पानी के निशान भी खोजे, जो कि इससे पहले कभी नहीं किया गया था।
लिहाजा, चंद्रयान-टू अभियान के असफल होने से मायूस होने की जरूरत नहीं है, क्योंकि भारतीय वैज्ञानिकों ने पूरी तरह अपने बूते पर वैज्ञानिक शोध का यह बीड़ा उठाकर पूरी दुनिया के सामने सिद्ध कर दिया है कि वे ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में किसी भी चुनौती को स्वीकारने में सक्षम हैं। चन्द्रमा के दक्षिणी धु्रव की सतह पर परीक्षण यान उतारने का साहस भारत के वे व्ौज्ञानिक ही कर सकते थे, जिन्हें अपनी विकसित की हुई अभियांत्रिकी और तकनीक पर पक्का यकीन हो, क्योंकि विज्ञान में असफलता नाम का कोई शब्द नहीं होता। प्रयोग के बाद प्रयोग करते रहना ही विज्ञान में अंतिम सफलता की सीढ़ी होती है और इस पर चढ़ने के लिए भारतीय अंतरिक्ष शोध संगठन-इसरो के वैज्ञानिक हमेशा से कठिबद्ध रहे हैं। आने वाले समय में ऐसे कई और प्रयोग किए जाने हैं, जिसमें निश्चित तौर पर हमें सफलता मिलेगी। पूरी दुनिया भी तहे दिल से इस बात को स्वीकार कर रही है कि भले ही चंद्रयान-टू आंशिक रूप से असफल हुआ, लेकिन भारत के वैज्ञानिकों ने जो स्पेस सुपरपावर बनने की महत्वाकांक्षा दिखाई है, वह अपने-आप में बहुत बड़ी बात है। ऐसे में, इससे बिल्कुल भी इनकार नहीं किया जा सकता है कि मिशन खत्म हो गया है, बल्कि यह भविष्य में होने वाले मिशन को धार देने का काम करेगा और भारत की कामयाबी की इबारत को सुनहरे शब्दों में लिखेगा

Friday, 6 September 2019

सत्ता वापसी का मौका

सत्ता वापसी का मौका
देवानंद सिंह
आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारी जोरों पर है। वैसे तो, चार राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। चुनावों की दृष्टि से सभी राज्य महत्वपूर्ण हैं, लेकिन झारखंड कई लिहाज से और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।

बीजेपी के सामने जहां फिर से सत्ता वापसी का मौका है, वहीं विपक्षी दल भी किसी प्रकार की चूक नहीं करना चाहेंगे। चुनावी समीकरणों के साथ-साथ पिछले पांच साल के कार्यों को समीक्षात्मक दृष्टि से देख्ों तो बीजेपी राज्य में अभी मजबूत स्थिति में है और चुनाव को लेकर उसकी तैयारी भी अन्य पार्टियों से अधिक गति से चल रही है। सत्ता वापसी के लिए प्रभावी रणनीति बनाने में जुटी भाजपा इस बार हर हाल में जीतना चाहती है। इसके लिए वह अपना घर तो मजबूत कर ही रही है, विरोधियों को भी कमजोर करने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। भाजपा के लिए झारखंड कितना महत्वपूर्ण है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकसभा चुनाव के बाद से पार्टी के कम-से-कम आधा दर्जन नेता राज्य में प्रवास कर चुके हैं। जातीय समीकरणों को खास तवज्जो दी जा रही है और अलग-अलग नेताओं को अलग-अलग जातियों के नेताओं से बात करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। इतना ही नहीं, भाजपा ने उन बूथों की पहचान की है, जहां से उसे बढ़त हासिल नहीं होती है। उन बूथों के लिए अलग-अलग लोगों को तैनात किया जा रहा है।

विपक्षियों में सेंध
भाजपा नेता लगातार विपक्षी खेमे में शामिल नेताओं और विधायकों के संपर्क हैं। खासकर, लोकसभा चुनाव के बाद इसमें और तेजी देखने को मिल रही है। कांग्रेस से जुड़े कई नेता अनौपचारिक तौर पर इस बात को स्वीकार कर चुके हैं। बताया जा रहा है कि यह संपर्क टेलीफोन या किसी अन्य माध्यम से नहीं किया जा रहा है, बल्कि भाजपा के लोग सीध्ो विपक्षी विधायकों और नेताओं के पास पहुंच रहे हैं। इसमें खास यह भी है कि दूसरे राज्यों से आकर लोग मिल रहे हैं। इस साफ होता है कि बीजेपी अपनी चुनावी रणनीति को कैसे अंजाम दे रही है। ऐसे में, साफ है कि विपक्षी दलों को भाजपा के बराबर आने के लिए अभी बहुत मेहतन करनी पड़ेगी। पार्टी के चुनाव प्रभारी ओम प्रकाश माथुर और सह प्रभारी नंद किशोर यादव राज्य का दौरा कर चुके हैं।

65 प्लस का लक्ष्य
बीजेपी की चुनाव मशीनरी राज्य में पूरी तरह सक्रिय है और पार्टी को हर हाल में 65 प्लस का लक्ष्य भ्ोदना है। विधानसभा चुनाव में दो तिहाई बहुमत हासिल करने की तैयारी में जुटी भाजपा ने एक किस्म की नई राजनीति को जमीन पर उतारा है। अब तक देखा जाता रहा है कि राजनीतिक दल अपना घर मतबूत करने में जुटते रहे हैं, लेकिन भाजपा ने इस बार विरोधियों को कमजोर करने पर खासा ध्यान लगा रखा है। पार्टी ने अपने घर को मजबूत बनाने पर तो ध्यान दिया ही है। इसी उद्देश्य को लेकर उसने राज्य में 25 लाख नए सदस्य बनाने का अभियान चला रखा है। इसके समानांतर पार्टी ने एक और अभियान विरोधियों को नेस्तनाबूद करने का जारी रखा है। इसके तहत विरोधी दलों के वैसे नेताओं से लगातार संपर्क किया जा रहा है, जो अपने इलाके में अच्छा-खासा प्रभाव रखते हैं।
पूरे राज्य में ऐसे कम-से-कम 2० नेताओं की पहचान की जा चुकी है और भाजपा के लोग उनसे नियमित संपर्क में हैं। ऐसी संभावना है कि ये नेता विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के ख्ोमे में शामिल हो सकते हैं।
भाजपा जिला अध्यक्ष दिनेश कुमार के नेतृत्व में भाजपा का चुनावी अभियान तेज हो चुका है जिला अध्यक्ष दिनेश संगठन और कार्यकर्ताओं टीम भावना जगाने में सफल रहे हैं जिसका परिणाम मुख्यमंत्री रघुवर दास के जमशेदपुर प्रवास व सदस्यता अभियान के दौरान भी देखने को मिला प्रदेश भाजपा के साथ समन्वय स्थापित करने में भी जिला अध्यक्ष ने कोई कसर नहीं छोड़ी हम यह भी कह सकते हैं की टीम भावना की बदौलत भाजपा जिलाध्यक्ष दिनेश कुमार अपनी अग्नि परीक्षण विधानसभा चुनाव में भी सफलतापूर्वक देंगे इनकी मीडिया टीम अंकित आनंद और युवा टीम अमरजीत सिंह राजा के नेतृत्व में जिले में अव्वल काम कर रही है
जातीय समीकरणों को महत्व
विरोधी दलों के नेताओं को अपने ख्ोमे में करने के क्रम में भाजपा जातीय समीकरण पर भी ध्यान दे रही है। पलामू का उदाहरण सामने है। लोकसभा चुनाव से पहले गिरिनाथ सिंह को अपने पाले में करने के बाद भाजपा ने वहां ब्राह्मण नेताओं से संपर्क साधा है। पलामू का राजनीतिक समीकरण कुछ इस प्रकार का रहा है कि वहां अगड़ों का समर्थन कांग्रेस के पास था, जबकि पिछडे वोटों का बंटवारा होता था। भाजपा ने गिरिनाथ सिंह के बाद पूर्व विधायक दशरथ सिंह के पुत्र प्रफुल्ल सिंह को अपने पाले में करने के लिए राजी कर लिया है। अब पांकी विधायक देवेंद्र सिंह उर्फ बिट्टू सिंह पर भाजपा की निगाह है। यदि, वह भी भाजपा में आ जाते हैं तो विरोधी दलों के पास राजपूत नेताओं का टोटा पड़ जाएगा। इसी तरह ब्राह्मण नेताओं से भी भाजपा के संपर्क का रिजल्ट अगले कुछ दिनों में निकलेगा और इसके सकारात्मक होने की उम्मीद जताई जा रही है। अगड़ी जातियों पर ध्यान देने से पहले भाजपा राज्य के प्रमुख यादव नेताओं से संपर्क साध चुकी है और इस बात के पूरे आसार हैं कि विधानसभा चुनाव आते-आते विरोधी दलों के पास यादव नेताओं का टोटा पड़ जाएगा।
आदिवासियों पर नजर
लोकसभा चुनाव में चाईबासा सीट हारने के बाद भाजपा ने आदिवासी मतों को साधने के लिए गंभीर कोशिश शुरू की है। इसके तहत कोल्हान में झामुमो को कमजोर करने की रणनीति तैयार की गई है। भाजपा ने कोल्हान के कम-से-कम पांच झामुमो विधायकों से संपर्क साधा है। इनमें खरसावां के दशरथ, गगराई, चक्रधरपुर के शशिभूषण सामड, मनोहरपुर की जोबा मांझी, चाईबासा के दीपक बिरुआ और बहरगोड़ा के कुणाल पाडंèगी शामिल हैं। चर्चा है कि ये विधायक पाला बदलने के लिए तैयार हो गए हैं। प्रदेश के नेताओंं के साथ साथ जमशेदपुर महानगर जिला अध्यक्ष दिनेश कुमार के अपनी पूरी टीम के साथ चुनावी रणनीति में जुटे हैं मुख्यमंत्री रघुवर दास केेे प्रवास के दौरान जिस तरह से कार्यकर्ताओं का जनसैलाब कार्यक्रम में देखनेेे को वह दिनेश टीम की मेहनत का परिणाम है या यह भी कह सकते हैं कि दिनेश की अग्नि परीक्षा भी है
भाजपा की इस रणनीति की एक और खास बात यह है कि झारखंड के विरोधी दलों के नेताओं से संपर्क करने की जिम्मेदारी प्रदेश के नेता को नहीं दी गई है। यह जिम्मा केंद्रीय नेताओं के पास ही है। यह पूरा अभियान पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा और रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के निर्देशन में सौदान सिंह, भूपेंद्र यादव, धर्मपाल सिंह और अन्य के कंधों पर टिका हुआ है। मुख्यमंत्री रघुवर दास को इस पूरे अभियान समन्वय की जिम्मेदारी मिली है। भाजपा की इस रणनीति का जवाब फिलहाल विपक्षी दलों के पास नहीं है। झामुमो के साथ झाविमो, कांग्रेस और राजद के नेता अब तक पूरी तरह चुनावी मोड में नहीं आ सके हैं। इससे साफ जाहिर होता है कि झारखंड विधान चुनाव के लिए भाजपा की तैयारी पुख्ता है और वह अपने लक्ष्य की ओर तेजी से बढ़ रही है। इन हालातों में विपक्षी दलों को बहुत मेहनत करने की जरूरत है, तभी वे चुनावी मैदान में बीजेपी का मुकाबला कर सकेंगें

Test

Test

खतरे में है ब्रह्मर्षि विकास मंच जमशेदपुर का अस्तित्व भाग 02

खतरे में है ब्रह्मर्षि विकास मंच जमशेदपुर का अस्तित्व देवानंद सिंह समाज को एक करने के लिए त्याग की जरूरत वोट और कुर्सी की ही राजनीति कर...