Sunday, 4 August 2019

सियासी हलचल ने बढ़ाई आशंका

जम्मू-कश्मीर: सियासी हलचल ने बढ़ाई आशंका
जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों पर अडवाइजरी और हजारों जवानों की तैनाती के बाद राज्य में जिस प्रकार सियासी हलचल तेज हुई है, उससे लग रहा है कि केंद्र सरकार वहां कुछ बड़ा कदम उठाने जा रही है। फौरी तौर पर भले ही लग रहा है कि केंद्र सरकार द्बारा वहां फोर्स को तैनात किए जाने के पीछे सुरक्षा से जुड़े हुए कारण हैं, क्योंकि वहां आतंकवादी हमले की संभावना बनी हुई है।
राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी साफ किया कि सुरक्षा के मद्देनजर ये कदम उठाए जा रहे हैं। सीमा पार पाकिस्तान पिछले कुछ दिनों से लगातार गोलीबारी कर रहा है। भारतीय सेना ने शनिवार को सीमा पार करने की कोशिश कर रहे सात आतंकियों को ढेर कर दिया था, लेकिन इन सबके बीच राज्य को जिस अलग-सी आशंका का माहौल है, उससे लग रहा है कि कश्मीर में कुछ बड़ा करने की तैयारी की जा रही है। हजारों लोग घाटी से निकलने की जद्दोजहद में दिख रहे हैं। बस स्टैंड और एयरपोर्ट पर पर्यटकों की भीड़ है। अमरनाथ यात्रा को 15 दिन पहले खत्म करने और पर्यटकों को कश्मीर छोड़ने की हिदायत देने के बाद घाटी में यह स्थिति है। शनिवार को पर्यटकों को घाटी से निकलने के लिए 72 घंटे का अल्टिमेटम दिया गया था, इससे साफ है कि सोमवार और मंगलवार तक कश्मीर के मसले पर कुछ बड़ा फैसला होने की उम्मीद है। अटकलें हैं कि मोदी सरकार अनुच्छेद 35ए खत्म कर अपना चुनावी वादा पूरा कर सकती है।
कश्मीर में तो हालत ये हैं कि वहां रह रहे हर किसी के भीतर दहशत और अफराफरी मची हुई है। जहां सरकारी अमला अपना ताम झाम दुरुस्त करने में जुटा है तो आम आदमी भी राशन की दुकानों पर लाइन में लगकर महीने भर का अनाज खरीद रहा है। एटीएम से लोग नकदी निकाल रहे हैं, ताकि किसी भी संभावित मुसीबत का सामना कर सकें। आम लोगों में अफरातफरी के बीच भी जिम्मेदार स्तर पर कोई सही जवाब नहीं दे रहा है। सभी अपनी जिम्मेदारी टालने में लगे हैं। आखिर, कश्मीर और कश्मीर को लेकर देश में बन रहे भय के माहौल की जिम्मेदारी किसी को तो लेनी होगी ?
कश्मीर में हर घंटे एक नई अफवाह पैदा हो रही हैं, जो लोगों के मन में नया संशय पैदा कर रही है। सभी जगह गहमागहमी का माहौल है। यह माहौल पिछले हफ्ते से तब बनना शुरू हुआ, जब कश्मीर में अर्धसैनिक बलों के 1० हजार अतिरिक्त जवान भेजे गए। यह भी बताया जा रहा है कि रेलवे ने वहां पर अपने अधिकारियों से कहा है कि चार महीने का राशन जमा कर लें। ये खबर भी तेजी से फैल रही है कि कश्मीर में और सुरक्षाबलों की तैनाती हो रही है। सेना और वायुसेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है।
इन सबके बीच राजनीतिक बाजार में धारा 35ए और और धारा 37० को लेकर बयानों ने माहौल को और तनाव में डाल दिया है। हर चगह चर्चा और सुगबुगाहट होने लगी है कि इन धाराओं पर क्या होगा? इसको देखते हुए सारे कश्मीरी नेताओं के सुर भी एक हो गए हैं। हर कोई कहने लगा कि अगर, इनसे छेड़छाड़ की गई तो कश्मीर जल उठेगा, हालांकि राज्यपाल सत्यपाल मलिक बार-बार कह रहे हैं कि ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा है, अफवाहों पर ध्यान ना दें।
यह बात सही है कि धारा 35ए और 37० को हटाना बीजेपी सरकार के एंजेडे में है। सरकार जब चाहे इसको लेकर कुछ फैसला कर सकती है, हालांकि यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है, इसीलिए दिल्ली इस मामले में खुलकर कुछ भी नहीं बोल रही है, जिससे और भी अनिश्चितिता का माहौल बनता जा रहा है। कई तरह की बातें सुनने में आ रही हैं। एक तो यह है कि आने वाले 15 अगस्त को प्रधानमंत्री कोई बड़ा ऐलान करने वाले हैं और सारी कवायद उसी को लेकर हो रही है। यह भी कहा जा रहा हे कि जम्मू को अलग राज्य बना दिया जाएगा और कश्मीर व लद्दाख केन्द्र शाषित प्रदेश बना दिया जाएगा। आने वाले दिनों में जम्मू कश्मीर में विधानसभा चुनाव होने हैं और सरकार की कोशिश होगी कि बिना किसी बाधा के चुनाव कराए उस लिहाज से भी इस हलचल को देखा जा रहा है।
उधर, हाल-फिहलाल में कुपवाड़ा और तंगधार में जिस तरह से पाकिस्तान की ओर से आतंकियों की घुसपैठ कराने की कोशिश हुई है, उसको लेकर सरकार कोई बड़ी कार्रवाई कर सकती है। यह संकेत भी मिल रहे हैं कि पाकिस्तान की कोशिश भारत को उकसाने की है, ताकि भारत कोई बड़ी कार्रवाई करे और वो कोई ऐसी हरकत करे, जिसके जाल में चाहे अनचाहे भारत फंस जाए। दरअसल, भारत के इनकार के बावजूद अमेरिका की ओर से दो बार कश्मीर को लेकर मध्यस्थता की बात करना भी समान्य बात नहीं लग रही है।
बड़ा सवाल यह भी है कि क्या कश्मीर को लेकर कोई भी बड़ा फैसला करने से पहले वहां के लोगों को विश्वास में नहीं लिया जाएगा? दिल्ली और मुंबई में बैठकर कैसे कश्मीरियत को समझा जा सकता है? अब तक यह भी साफ हो चुका है कि कश्मीर समस्या का समाधान सुरक्षा बलों के बंदूकों की नोंक पर नहीं हो सकता है, हमें राजनीतिक रास्ता तलाशना होगा। कश्मीर के आम लोगों के दिलों के जरिए दिमाग तक पहुंचना होगा, तभी कुछ बात बनेगी।

Saturday, 1 June 2019

मंत्रालयों के विभाजन में दिखा तालमेल

मंत्रालयों के विभाजन में दिखा तालमेल

मंत्रालयों के विभाजन में दिखा तालमेल

देवानंद सिंह 
प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में लौटी बीजेपी सरकार ने शपथ ग्रहण कर मंत्रालयों का बंटवारा भी कर दिया है। मंत्रालयों के विभाजन को लेकर पीएम मोदी ने बेहतर तालमेल बिठाने की कोशिश की है। खासकर, जिस तरह से अपनी कैबिनेट में लगभग हर राज्य को स्थान देने की कोशिश की गई है, वह कहीं-न-कहीं संबंधित राज्य व वहां के सहयोगी दलों को साधने का बेहतर प्रयास है। चार बड़े मंत्रालयों में शामिल गृह, रक्षा, वित्त और विदेश मंत्रालय को क्रमश: अमित शाह, राजनाथ सिह, निर्मला सीतारमण और एस. जयशंकर को दिया गया है। इस क्रम में दो चीजें जो चौंकाती हैं, उनमें राजनाथ सिंह का पिछला गृह मंत्रालय बदलकर अमित शाह को दिया जाना। ऐसे में, कंफ्यूजन यह है कि आखिरकार सरकार में नंबर-दो की हैसियत किसके पास होगी ? दूसरी जो चीज चौंकाती है, वह एस. जयशंकर को विदेश मंत्री बनाया जाना। बशर्ते, यह सरकार की बेहतर रणनीति का हिस्सा हो सकता है।
वहीं, दूसरी तरफ पिछली एनडीए सरकार के तमाम मंत्रियों को इस बार भी रखा गया है। उनके पोर्टफोलियो या तो पहले की तरह ही रहे हैं या फिर उन्हें उन मंत्रालयों के अलावा कुछ के अतिरिक्त प्रभार दिए गए हैं। नितिन गडकरी को पिछली बार की ही तरह सड़क परिवहन मंत्री बनाया गया है और उन्हें सूक्ष्म, लघु और मध्य उद्योग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है। मुख्तार अब्बास नकवी को भी पिछली बार की ही तरह अल्पसंख्यक मामलों का मंत्री बनाया गया है। राज्य मंत्री हरदीप पुरी के भी शहरी मामलों के मंत्रालय को रीटेन किया गया है। साथ में, उन्हें नागिरक उड्डयन के साथ-साथ वाणिज्य और उद्योग का अतिरिक्त प्रभार दिया गया है।
एक साथ वाजपेई सरकार में बने दो राज्य उत्तराखंड और झारखंड को भी कैबिनेट में जगह देने से साफ जाहिर होता है कि पीएम मोदी दोनों राज्यों का तरजीह देते हैं। इसका कारण भी है, क्योंकि दोनों ही राज्यों को बीजेपी का गढ़ माना जाता है। उत्तराखंड से जहां रमेश पोखरियाल को महत्वपूर्ण मानव संसाधन मंत्रालय दिया गया है, वहीं झारखंड के दिग्गज नेता अर्जुन मुंडा को आदिवासी मामलों का मंत्रालय दिया गया है। यह इसीलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि मुंडा एक आदिवासी चेहरा हैं, जिनकी आदिवासी समाज में राष्ट्रीय स्तर पर अच्छी पैठ है। उनको मंत्रालय मिलने से इस क्षेञ में तमाम सुधारों की उम्मीद बढ़ जाती है। उधर,
पूर्व विदेश सचिव सुब्रमण्यम जयशंकर को विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी देना साफ तौर पर दिखाता है कि पीएम मोदी ने विशेषज्ञ को वरीयता दी है। यहां बता दें कि पिछले जनवरी को रिटायर हुए जयशंकर ने भारत-अमेरिका सिविल न्यूक्लियर डील को पास कराने में अहम भूमिका निभाई थी। इसी तरह निर्मला सीतारमण ने पिछली सरकार में जिस तरह बतौर रक्षा मंत्री राफेल डील को संसद से लेकर बाहर तक सरकार का मजबूती से बचाव किया, उसकी उनके भारत की पहली फुल-टाइम महिला वित्त मंत्री बनने में अहम भूमिका रही।
पिछली बार की तरह बीजेपी ने इस बार भी न सिर्फ अकेले दम पर बहुमत हासिल किया है बल्कि अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के रेकॉर्ड में भी सुधार किया है। इसके बावजूद मोदी ने सहयोगी दलों को भी कुछ मंत्रालय दिए हैं। कुछ मंत्रालयों को क्लब करते हुए किसी एक मंत्री के तहत कर दिया गया है। उदाहरण के तौर पर, पीयूष गोयल के पास रेलवे के साथ-साथ वाणिज्य और उद्योग की भी कमान है। ऐसा करने की वजह से मोदी जब आगे कैबिनेट का विस्तार करेंगे तो इन अतिरिक्त मंत्रालयों को सहयोगी दलों को आवंटित कर सकेंगे। हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं, वहीं दिल्ली और बिहार में अगले साल चुनाव हैं। लिहाजा, कैबिनेट विस्तार लाजिमी है और मजबूरी भी। एनडीए की प्रमुख सहयोगी जेडीयू ने कैबिनेट में यह कहकर शामिल होने से इनकार कर दिया कि उसे सांकेतिक प्रतिनिधित्व में कोई दिलचस्पी नहीं है। इसी तरह शिवसेना ने भी और मंत्रालयों की मांग की थी, लेकिन उसे सिर्फ एक कैबिनेट मंत्री मिला। ऐसे में, कैबिनेट विस्तार में सहयोगी दलों को साधा जा सकेगा।
यह बात भी दीगार है कि मोदी सरकार में सभी जातियों को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश हुई है। सबसे ज्यादा 33 मंत्री अपरकास्ट से बनाए गए हैं। पिछली बार यह संख्या 2० थी। इसी तरह 12 मंत्री ओबीसी समुदाय से हैं। पिछली बार 13 थे। दलितों को पिछली बार के मुकाबले ज्यादा प्रतिनिधित्व दिया गया है। पिछली बार 3 दलित मंत्री बने थे तो इस बार 6 मंत्री बने हैं। इसके अलावा आदिवासी समुदाय से 4 लोगों को मंत्री बनाया गया है। पिछली बार यह संख्या 6 थी। पिछली सरकार में मंत्री रहे कई सांसदों को इस बार मंत्री नहीं बनाया गया है। इनमें मुख्य रूप मेनका गांधी, राज्यवर्द्धन सिंह राठौड़, विजय गोयल, डा. महेश शर्मा सहित कई अन्य नेता शामिल हैं। देखने वाली बात यह है कि क्या सरकार आने वाले दिनों में इन्हें भी मंत्रीमंडल में शामिल करेगी या फिर सांसद के तौर पर ही काम करना पड़ेगा।

Saturday, 25 May 2019

जनादेश के 'मायने’ महानायक मोदी

देवानंद सिंह
जब कोई उम्मीदों पर खरा उतरता है तो उसका परिणाम लाजवाब होता है
लोकसभा चुनावों का परिणाम सामने आ चुका है। बीजेपी ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में फिर वापसी की है। महागठबंधन की नैया से स्वयं को पार लगाने की कोशिशों जुटे विपक्षियों का इस तरह सूपड़ा साफ हुआ कि उनके लिए न उगलते बन रहा है और न ही निगलते। इस बात पर कोई शक नहीं की है कि साल-2014 में मोदी लहर थी, लेकिन इस बार के परिणामों से साफ जाहिर होता है कि यह लहर ही नहीं, बल्कि सुनामी है, क्योंकि इस सुनामी के पीछे लोगों का विश्वास भी था। यह विश्वास काम के दम पर बना, जबकि 2014 में उम्मीद के पीछे एक विश्वास की किरण थी। दोनों में फर्क होता है, क्योंकि जब कोई उम्मीद पर खरा उतरता है तो उसका परिणाम और भी लाजवाब होता है। लोकसभा चुनावों का परिणाम इसी का नतीजा है।

वास्तव में, इस जनादेश के बड़े मायने हैं, जो पार्टियां परिवारवाद, भाई-भतीजावाद, जातिवाद को राजनीति में बढ़ावा दे रहे थ्ो, उनके लिए यह किसी सबक से कम नहीं है। यह परिवर्तन का दौर है। यहां अब पूर्ववतीã सोच नहीं चलेगी, बल्कि यहां परिवर्तनकारी और विकास के मॉडल को आगे बढ़ाने की सोच की जरूरत है। आजादी के कई दशकों के बाद भी अगर, देश में भूखमरी, गरीबी, अशिक्षा, बेरोजगारी आदि आज भी बरकरार है तो उसके लिए कौन जिम्मेदार है। अगर, पूर्व में रही सरकारें इस तरफ ध्यान देती तो निश्चित ही देश की तस्वीर अलग होती।
दूसरा, क्षेत्रीय पार्टियों ने जिस तरह राजनीति का मॉडल परिवारवाद और जातिवाद के आधार पर तैयार किया, उससे समाज के बीच और भी गहराई बढ़ती गई। ऐसी परिस्थितियों में उस गहराई को पटाने की जरूरत थी। आम आदमी को भी ऊंचे पायदान की तरफ ले जाने की सोच की जरूरत थी। लिहाजा, पिछले पांच वर्ष के दौरान मोदी के नेतृत्व में इस क्षेत्र में व्यापक काम किया गया। लोगों ने इसे देखा और महसूस भी किया। नतीजन फिर से मोदी के प्रति बड़ा जनादेश सामने आया है।
विपक्षियों की बात करें तो उनके पास कोई ऐसा मुद्दा नहीं था, जिसके आधार पर जनादेश में परिवर्तन देखने को मिलता। उन्होंने मोदी-शाह हटाओ के नारे के साथ स्वयं को मजबूत नहीं, बल्कि बीजेपी की जीत में ही भूमिका निभाई। अपने सैद्धांतिक विचारों को तिलांजलि देकर देश की अधिकांश पार्टियां जिस प्रकार मोदी के खिलाफ एक मंच पर आईं, उससे लोगों के बीच रोष था, क्योंकि उनके पास जनता से संबंधित कोई भी मुद्दे नहीं थे
अगर, मुद्दे होते तो शायद इसका परिणाम थोड़ा-बहुत तो अलग होता ही। यहां साफ हो गया है अब देश में विभाजनकारी सोच के लिए कोई जगह नहीं है। लिहाजा, मोदी की सुनामी के बाद अपने अस्तित्व को संकट में डालने वाली पार्टियों को गहन सोच-विचार करने की जरूरत है। वंशवाद के खिलाफ आए नतीजों ने जहां एक तरफ बड़े-बड़े नेताओं व उनके परिवारों को उखाड़ फेंका, वहीं, एक विकास रूपी सोच को पिरोने का रास्ता भी प्रशस्त किया। पिछली बार से भी बड़ी जीत का दावा करते रहे मोदी ने न सिर्फ यह साबित किया है, बल्कि यह भी जता दिया है कि भविष्य की राजनीति सिर्फ खोखले नारों पर हो ही नहीं सकती है। अब विश्वास की जमीन पर ही नारे भी चलेंगे और वोट भी पड़ेंगे। व्यक्गित आरोप-प्रत्यारोप भी सिर्फ उसी की सुनी जाएगी जो भरोसे और विश्वास के तराजू पर फिट बैठता हो। यह भरोसा सिर्फ नारों से नहीं जीता जा सकता है, बल्कि उसके लिए आम लोगों से कनेक्ट तो होना ही पड़ता है, बल्कि उसके अनुरूप काम भी करना पड़ता है। जो सिर्फ अपनों को बढ़ाने की बात करेगा, अब उसका जमाना गया, बल्कि यहां देश की बात करनी पड़ेगी। देश की सुरक्षा की बात करनी पड़ेगी। विकास के नए मॉडल की बात करनी पड़ेगी। तभी देश की जनता भी उसके साथ खड़ी नजर आएगी। देश की जनता बहुत जागरूक है। यह युवाओं का देश है। युवा भली-भांति जानते हैं कि देश का हित किसके हाथ में सुरक्षित है। इसीलिए चालबाजी से काम नहीं चलेगा, बल्कि काम करना पड़ेगा। जब तक जीत का सार्थक मंत्र जनता के सामने पेश नहीं किया जाएगा, तब तक जीत असंभव है। मोदी ने जनता को जीत का मंत्र देने में विपक्षियों को कहीं पीछे छोड़ दिया। विपक्षी मोदी-शाह हटाओ के नारे देते रहे, लेकिन मोदी जीत के मंत्र के साथ लोगों के बीच गए। उन्होंने मजबूत और निर्णायक नेतृत्व का भरोसा दिया। पिछले पांच साल के कार्यकाल में इसे खुले तौर पर देखने को भी मिला। इसी का नतीजा रहा कि लोगों ने भी मोदी के उस भरोसे को कायम रखा।
जो दिग्गज इस शिगूफे में थे
कि वे जमघट बनाकर मोदी को पटखनी देंगे, वे ही हर तरफ धराशाही हो गए। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर-प्रदेश को ही ले लेते हैं। सपा-बसपा की गोलबंदी कोई काम नहीं आई। दोनों पार्टियां चारों खाने चित्त हो गईं। चंद्रबाबू नायडु, ममता बनर्जी का बुरा हाल तो हुआ ही बल्कि परिवारवाद की नाव में सवार कई और दिग्गज भी पानी मांगने के लायक नहीं रहे।
झारखंड का हाल इन सब से अलग नहीं रहा मुख्यमंत्री रघुवर दास अपने काम की बदौलत साथ में मोदी के नाम पर जनता से वोट मांगा और पूरे झारखंड में 2014 की स्थिति को बरकरार रखने के साथ-साथ संथाल में अपनी रणनीति में सफल भी रहे हालाकि प्रदेश अध्यक्ष की सीट बचाने में वे नाकामयाब रहे कारण स्पष्ट था जनता उनसे नाराज चल रही थी प्रदेश अध्यक्ष को अपने हाई-फाई साथी का नुकसान उठाना पड़ा
वही झारखंड के छात्रों को राज्य की जनता ने सबक सिखाने का काम भी किया तथा यह संदेश भी दिया की खोखले वादे पर जनता नहीं विश्वास करती जबकि दुनिया में स्वयं को सबसेअधिक ईमानदार नेता बताने वाले अरविंद केजरीवाल का वह हाल हुआ कि वह दिल्ली वालों को मुंह दिखाने के काबिल नहीं रहा। शायद, इन पार्टियों के पास मुद्दे होते, जनता के प्रति नेक इरादे होते तो शायद कुछ और संघर्ष करते, लेकिन उन्होंने पूरे छलावे के साथ चुनाव मैदान में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इसी का नतीजा रहा है कि लोगों का भरोसा मोदी के प्रति उभरा। इसीलिए इस जनादेश के मायने अपने-आप में बढ़ जाते हैं और मोदी जी की जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है कि वह आगामी पांच सालों राष्ट्र के विकास में वह भूमिका निभाएं जिससे लोगों का विश्वास उनके प्रति और भी गहरा और प्रगाढ़ होता जाए

Thursday, 11 April 2019

समाज को बांटने की कोशिश

समाज को बांटने की कोशिश
लोकसभा चुनाव के लिए पहले चरण का मतदान कल यानि 11 अप्रैल से शुरू हो जाएगा। इस चरण के लिए चुनाव प्रचार 9 अप्रैल को शाम पांच बजे समा’ हो गया था। पहले चरण में यूपी के कई क्ष्ोत्रों में व उत्तराखंड में चुनाव होने हैं। चुनाव हों और उसको लेकर कोई अपवाद न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता है। राजनेता जिस तरह संविधान और चुनाव आयोग की गाउडलाइन का मजाक बनाते हैं, ऐसे बहुत से उदाहरण चुनावी दौर में देखने को मिलते हैं। इस बार भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं। चाहे वह आचार संहिता को ठेंगा दिखाने की बात हो या फिर समाज को धर्म-जाति व सम्प्रदाय के नाम पर बांटने की कोशिश।
यहां महज एक उदाहरण लेते हैं। यह वाक्या है सहारनपुर का। यहां एक जनसभा में बसपा सुप्रीमो मायावती ने खुलकर मुस्लिम मतदाताओं से कहा कि अपना वोट बंटने न दें, बल्कि वे एकमुश्त होकर बसपा-सपा और रालोद प्रत्याशियों को ही वोट दें। मायावती द्बारा इस तरह से वोट मांगने का तरीका चुनावों के लिए बनाए गए जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1951 कानून के पूरी तरह खिलाफ है। इस कानून के तहत धार्मिक आधार पर वोट मांगने की सख्त मनाही है। इसके बाद भी अगर, मायावती ने खुली सभा में धार्मिक आधार पर वोट मांगे तो क्या यह जनप्रतिधित्व अधिनियम के खिलाफ नहीं है। हमेशा हम धर्मनिरपेक्ष देश व समाज में रहने की बात करते हैं, अगर, उसके बाद भी हम अपने राजनीतिक फायदे व महत्वाकांक्षा के लिए समाज व देश को धर्म-जाति व सम्प्रदाय के नाम पर बांटने की कोशिश करते हैं तो यह निहायत ही गलत और देश के संविधान के मूल के खिलाफ है।
उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में इस तरह के वाक्ये पहले भी सामने आते रहे हैं, जब कुछ पार्टियां इस बात को मानकर चलती हैं कि विश्ोष समुदाय और जाति के लोग सिर्फ उन्हीं को वोट करेंगे। वोट के आकड़ों से भले ही यह पता चलता भी है तो इसमें कोई गुरेज नहीं है। संबंधित लोगों की किस पार्टी और विचारधारा में अधिक आस्था है, यह वह ही बता सकता है, लेकिन जब एक जनप्रतिनिधि खुले तौर पर वोट मांगता है तो इसका मतलब तो यही है कि वह समाज को धर्म-जाति और सम्प्रदाय के रूप में बांट रहा है। समाज में साम्प्रदायिक उन्माद को फैलाने की कोशिश करता है। इस तरह का उदाहरण मायावती से ही जोड़कर नहीं देखा जा रहा है बल्कि दूसरी पार्टियां भी इस तरह की स्थितियों को पैदा करने की कोशिश करती रहती हैं। इसका कारण यही है कि आज समाज के अंदर इस तरह का खांचा तैयार हो गया है, जिसमें हर कोई स्वयं को एक-दूसरे से अलग पाता है। एक-दूसरे से डर की भावना उसके अंदर बनी रहती है। यह स्थिति तब और खतरनाक हो जाती है, जब कोई राजनीतिक पार्टी सत्ता हासिल करने में सफल हो जाती है और उस जाति व सम्प्रदाय के लोगों के लिए काम नहीं करती है,जो उसके वोट बैंक का हिस्सा नहीं होता है। यह स्थिति देश के संविधान के मूल के खिलाफ है। देश का मूल धर्मनिरपेक्षता है। भारत को दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र बनाने में इसी मूल की सबसे बड़ी ताकत रही है, लेकिन लोकतांत्रिक इतिहास के पन्ने खोदकर देख्ों तो हमारी राजनीतिक पार्टियों ने देश को एकसूत्र में बांधने के बजाय उन्हें धर्म-जाति और सम्प्रदाय के खांचों में बांट दिया। इसके पीछे महज उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षा जिम्मेदार रही है। इन मुद्दों को लेकर राजनीतिक पार्टियों के पास बहुत सारे तथ्य हैं, लेकिन देश के विकास को लेकर उनके पास कोई भी खाका नहीं है। यही वजह है कि आजादी के लंबे अर्से के बाद भी देश में गरीबी, अशिक्षा और आर्थिक असमानता बनी हुई है।
देश में किसानों की हालत किसी से छुपी नहीं है, वे आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो रहे हैं। देश भ्रष्टाचार, कालाबाजारी के मकड़जाल में ऐसा फंसा हुआ है कि उसे इन परिस्थितियों से निकलने में बहुत लंबा समय लगेगा। समाज में दंगे, फसाद कराने की मूल जड़ भी हमारी राजनीतिक पार्टियां ही रही हैं, लेकिन इस परिपेक्ष्य में देश की जनता हमेशा जागरूक होती जा रही है। उसे राजनीतिक पार्टियों की मूल भावना समझ में आ गई है, लिहाजा, वह अपने मत का प्रयोग विवेकशीलता के साथ करने लगी है। उसके मन में विकास, रोजगार और तरक्की का खाका है। जिस पर राजनीतिक पार्टियों को भी अपना गोल सेट करना होगा। उनका यह फार्मुला किसी तरह से काम नहीं करेगा, जिसमें वे समाज को जाति-धर्म व सम्प्रदाय के नाम पर बांटने की कोशिश करते हैं।

Wednesday, 20 March 2019

होली की अदालत

🙏🌅नमस्कार 🌅🙏
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🌹दिनांक20मार्च दिन बुधवार
2019🌹
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सजनी की आँखों में छुप कर जब झाँका
बिन होली खेले ही साजन भीग गया
🙏🌹जमशेदपुर संवाद🌹🙏
✍मुख्यमंत्री ने की दूसरी शादी बधाई देने पहुँची  ममता बनर्जी ।
✍हेमंत सोरेन का जेएमएम से इस्तीफा ,खेती करने का किया फैसला ।
✍बाबूलाल मरांडी ने जेवीएम पार्टी का किया भाजपा  में विलय ।
✍पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा बने उड़ीसा  के राज्यपाल
✍मंत्री सरयू राय का इस्तीफा चले बिहार । बन्ना गुप्ता पहुँचे मनाने।
✍साहित्यकार हरिबल्लभ सिंह आरसी बॉलीवुड में फिल्म निर्माण करेगें
✍अभिभावक किशोर कुमार हेमामालिन के साथ फरार विरसानगर थाना में मामला दर्ज
✍आजसू सुप्रीमो सुदेश महतों बने पंजाब के उपमुख्यमंत्री।
✍ कोल्हान के डीआईजी  बने बिहार के डीजीपी
✍कांग्रेस के प्रदेश महामंत्री अशोक चौधरी पहुँचे जेवीएम कार्यालय फिर पार्टी को करेंगे खड़ा
✍भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता राजेश शुक्ल ने राजनीति छोड़कर  शुरू किया कपड़े का व्यापार ।
✍कांग्रेस जिला अध्यक्ष बिजय खान भाजपा में शामिल
✍भाजपा जिला अध्यक्ष दिनेश हुए गुमशुदा । पुलिस में शिकायत दर्ज कराने पहुंचे  मामा रघुवर दास !
✍भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष दिनेशानंद गोस्वामी जेएमएम में शामिल
✍विधायक कुणाल षाड़ंगी कांग्रेस की टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ेगे धनबाद से
✍पञकार कौशल राखी सावंत के साथ मुम्बई में दिखे
✍पञकार  जितेंद्र प्रियंका चोपड़ा के साथ होटल सिटी इन में देखे गए
✍जेवीएम जिला अध्यक्ष बबुआ सिंह ने किया सन्यासी बनने का फैसला, निकले कुंभ की ओर  ।
✍आजसू संयोजक चंद्रगुप्त सिंह पहुँचे राहुल के पास ।
✍जेवीएम के केन्द्रीय महासचिव अभय सिंह को सरयू राय ने कराया भाजपा में शामिल
✍भाजपा नेता भरत सिंह बने यूपी भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ।
✍लीपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष सुभाष सिंह बने डीएभीपी के डीजी
✍पञकार मनोरंजन सिंह बने आज तक के संपादक
✍प्रभात खबर के स्थानीय संपादक  इंडिया टूडे के संपादक
✍इस्पात मेल के निदेशक छोटकू जी बने प्रेस काउंसिल के चेयरमैन
✍चमकता आईना के संपादक जयप्रकाश राय ने दिया इस्तीफा चले बनेंगे सहारा के संपादक
✍उदितवाणी से राधेश्याम अग्रवाल का इस्तीफा उदित अग्रवाल को भी किया किनारा मचा कोहराम
✍ब्रह्मर्षि विकास मंच के संस्थापक महासचिव राजकिशोर सिंह ने किया दूसरी शादी बधाई देने पहुंचे से अध्यक्ष विकास सिंह
✍समाजसेवी सह ब्रह्मर्षि विकास मंच ( भी) जमशेदपुर के अध्यक्ष विकास सिंह बनेंगे करणी सेना के अध्यक्ष
✍ ब्रह्मर्षि विकास मंच के महासचिव अनिल ठाकुर बने दलित सेना के प्रवक्ता
✍अंजनी पांडेय का सहारा से छुट्टी पहुँचे इंडिया न्यूज
✍पञकार ब्रजेश बने दैनिक जागरण के संपादक
✍पञकार रवि झा बने मिथलांचल टीवी हेड
✍पञकार अन्नी जी ने टीवी की ओर किया रूख
✍फोटो ग्राफर उमाशंकर दुबे बने मुख्यमंत्री के सलाहकार
✍पञकार सतेेन्द्र ने थामा हरिनारायण जी का फिर से दामन
✍पञकार संदीप डालटनगंज प्रभात के होंगे संपादक
✍कवयित्री डॉ कल्याणी कबीर ने कविता को कहा अलविदा,  बनी संन्यासिनी
✍राष्ट्र संवाद के प्रबंध संपादक रश्मि सिंह बनाएँगी कॉमेडी फिल्म
✍डॉ अनिता शर्मा का स्कूल से इस्तीफा बनाएँगी मॉल
✍ब्रह्मर्षि विकास मंच( पी )के अध्यक्ष राम प्रकाश पांडे का इस्तीफा करेंगे राजपूताना रेजीमेंट का प्रतिनिधित्व
✍वास्तु विहार से कृष्णा राय का इस्तीफा सुधीर सिंह से मिलाया हाथ
✍सीएम के पीएस एम चौधरी बने अमित शाह के पीएस
✍मुख्यमंत्री ओएसडी राकेश चौधरी बने पीएम के ओएसडी
✍ नगर विकास विभाग के सहायक निदेशक संजय पांडेय बने राजभवन के  प्रवक्ता
✍न्यूज कोल्हान के केशरी करेंगे फिल्म निर्माण
✍समाचार विचार छोड़ राज करेंगे देश पर राज
✍विवेक बने बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष
✍आईएमए के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय राय ने लिया पञकारिता छोड़ने का निर्णय करेंगे रामायण पाठ
✍पञकार अशोक झा बने मिथलांचल अखबार के संपादक
✍राष्ट्र संवाद के जीएम धीरज बनाएँगे आरक्षण मुक्त भारत
✍ जमशेदपुर उपायुक्त अमित कुमार बने चुनाव आयोग के चेयरमैन
✍ एसएससी जमशेदपुर वृंदावन में राधिकाओं के  साथ मना रहे हैं होली
✍सिटी एसपी प्रभात कुमार बने रॉ के निदेशक
✍राष्ट्र संवाद के अमित मिश्रा बने पुलिस पदाधिकारी
✍पुलिस एसोसिएशन के अध्यक्ष ने दिया इस्तीफा  बिरसा नगर थाना प्रभारी भूषण कुमार बने अध्यक्ष
✍ पत्रकार अजय महतों बने शिबू सोरेन के सलाहकार
✍ पत्रकार प्रियरंजन लड़ेंगे चुनाव
✍ जमशेदपुर के उपायुक्त का तबादला बने मुख्य सचिव
✍ SSP जमशेदपुर बने डीजीपी झारखंड
✍ पत्रकार श्याम दैनिक भास्कर छोड़ संभालेंगे चमकता आईना
✍ पत्रकार अश्वनी पत्रकारिता छोड़ टाटा वर्कर्स यूनियन के बने अध्यक्ष
✍ पत्रकार शंभू श्रवण पत्रकारिता को किया अलविदा करेंगे ठेकेदारी
✍ भाजपा नेता शैलेंद्र सिंह ने किया भाजपा को टाटा कांग्रेस में शामिल
✍ भाजपा नेता अमरप्रीत सिंह काले भाजपा छोड़ पहुंचे बाबा के दरबार में
✍ बारीडीह के मुरारी चले मायावती से भेट  करने
✍भाजपा के जिला प्रवक्ता अंकित आनंद ने संभाला कांग्रेस  प्रवक्ता प्रभार
✍अमन कुमार चले राष्ट्र संवाद को लेकर अरणव की राह पर
✍सांसद विद्युत वरण महतो राज्यसभा सांसद रेखा के साथ चल दिए हनीमून पर मचा कोहराम
✍कांग्रेस जिला अध्यक्ष विजय खान बने आरएसएस प्रमुख
✍भाजपा के चाणक्य अनिल सिंह कन्हैया कुमार को टक्कर देंगे बेगूसराय में
✍कांग्रेस कोल्हान के प्रवक्ता राकेश तिवारी व सुरेश धारी का इस्तीफा गिलुआ ने कराया भाजपा में शामिल
✍भाजयुमो से सौरभ ने किया पूर्वी विधानसभा से चुनाव लड़ने की तैयारी
✍कांग्रेसी नेता ऋषि पांडे भाजपा में शामिल
✍ जमशेदपुर के सिविल सर्जन बने aiims के डायरेक्टर
✍ पत्नी प्रेम में प्रज्ञा प्रवाह संयोजक मयंक रंजन झारखंड छोड़ भागे
✍ राष्ट्र संबाद के विजय शंकर मिश्रा और रत्नेश कुमार बाज पैसे लगेंगे चुनाव
✍ राष्ट्र संवाद की हिटलर बनी रुपम
✍ कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय फिर से करेंगे डॉक्टरी  कांग्रेसियों को लगी बीमारी
✍ हिंदुस्तान मित्र मंडल मध्य विद्यालय के प्रधानाध्यापक संदेश चौधरी बने लोयला के प्राचार्य
✍राष्ट्र संवाद के पत्रकार सौरभ, निजाम, गौरव ,अरविंद, कृष्ण कुमार ,मुकेश ,अर्जुन शाही, गोपियों के साथ रंग खेलने में मस्त
✍ केंद्रीय शांति समिति के महासचिव  रामबाबू सिंह, अरुण सिंह अरविंद पांडे के साथ वास्तु विहार से राजेश मिश्रा कंगना रावत के साथ फरार बिष्टुपुर थाने में मामला दर्ज
✍अप्पू तिवारी बने भीम सेना के संयोजक
✍सभी मित्रों की धर्म पत्नी ने संभाला होममिनिटर का प्रभार
*बुरा न मानो होली है*
भांग थोड़ा ज्यादा पी लिया खबरीलाल ने
*आप सभी और आपके परिवार को "होली की ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं"*
🌹आपका दिन मंगलमय हो 🌹
🙏🌹 धन्यवाद 🌹🙏
🙏🌹देवानंद सिंह 🌹🙏
🌹संपादक 🌹
🌅 राष्ट्र संवाद🌅

Thursday, 28 February 2019

रघुवर सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है और अफसरशाही हावी:राकेश तिवारी

विज्ञापन की सरकार को जड़ से उखाड़ने का काम करेगी कांग्रेस
कांग्रेस नेताओं के लिए चुनौती बनी राहुल गांधी की उलगुलान रैली, रैली की सफलता के लिए कांग्रेस में एक जुटता दिखाई दे रही है सभी वरिष्ठ नेता अपनी अहम को छोड़ कर कार्यक्रम की तैयारी में लगे हैं राहुल की रैली से पहले माहौल बनाने के लिए पूरे प्रदेश के कांग्रेसी नेता जुटे हुए हैं खुद रैली की मॉनिटरिंग प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर अजय के साथ साथ झारखंड प्रभारी आरपीएन सिंह सह प्रभारी उमंग सिंघार मंत्री वन एवं पर्यावरण मध्य प्रदेश के साथ मैनुल हक कर रहे हैं

प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी उलगुलान रैली के माध्यम से कार्यकर्ताओं में जोश भरने का काम कर रहे हैं जबकि राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी इस रैली के माध्यम से झारखंड में चुनावी माहौल बनाने का प्रयास करेंगे
इस रैली में कोल्हान की बड़ी भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कोल्हान के प्रवक्ता राकेश तिवारी भी दिन रात एक किए हुए हैं इसी कड़ी में संवाद की अदालत में राकेश तिवारी को लाने का काम राष्ट्र सवाद ने किया है
प्रश्न: पुलवामा हमले के बाद आखिर झारखंड में रैली की क्या आवश्यकता थी
उत्तर: थोड़ा रुक कर राकेश तिवारी ने कहा की भाजपा सरकार चाहे केंद्र सरकार या राज्य सरकार हर मोर्चे पर विफल रही है सेना की शहादत पर प्रधानमंत्री खुद सियासत कर रहे हैं और अपने नेताओं से सियासत करवा रहे हैं तिवारी ने कहा कि
कर्नाटक के पूर्व भाजपाई मुख्यमंत्री वीएस येदयुरप्पा नेे कहा कि एयर स्ट्राइक से मोदी लहर पैदा हुई है। इस बयान को लेकर कोल्हान के प्रवक्ता राकेश तिवारी ने पूर्व सीएम पर निशाना साधा है राकेश तिवारी ने कहा है की सरकार हर मोर्चे पर विफल है सेना के बल पर सियासत करने से परहेज करना चाहिए
उन्होंने कहा कि जवानों का जीवन चुनावी राजनीति से ज्यादा कीमती है
प्रश्न: रघुवर सरकार  के कार्यकाल को कितने मार्क्स देते हैं
उत्तर: जिस सरकार में मंत्री और विधायक सरकार के कामों से खुश नहीं है उस सरकार को नंबर पाने का कोई हक नहीं यह सरकार विज्ञापन की सरकार है और कांग्रेस इस सरकार को जड़ से उखाड़ने का काम करेगी राहुल गांधी उलगुलान रैली के माध्यम से कार्यकर्ताओं में जोश भरेंगे वहीं कांग्रेस कार्यकर्ता सरकार की खामियों घर घर पहुंचाने का काम करेगी
प्रश्न: मालिकाना हक के मुद्दे को आप किस तरह देख रहे हैं और पीएम आवास योजना से कितने लोगों को फायदा होगा
उत्तर: मालिकाना हक के मुद्दे को लेकर रघुवर विधायक से लेकर मुख्यमंत्री तक का सफर तय की है लेकिन मालिकाना का मुद्दा वही का वही रहा अब जब चुनाव सामने है तो फिर जनता के सामने जुमलेबाजी चालू हो चुका है मालिकाना हक तो मिला नहीं अब पीएम आवास के नाम पर जनता की भावनाओं से रघुवर कर रहे हैं खिलवाड़
 प्रश्न: उलगुलान रैली को आप किस तरह मापते हैं
उत्तर: उलगुलान रैली झारखंड की धरती पर मील का पत्थर साबित होगा
प्रश्न: झारखंड में भ्रष्टाचार और अफसरशाही को आप किस नजरिए से देखते हैं
उत्तर: वर्तमान सरकार में भ्रष्टाचार बढ़ा है और अफसरशाही हावी हुआ है वर्तमान सरकार सिर्फ और सिर्फ अखबारों के माध्यम से विकास कर रही है जबकि जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है यह सरकार उद्योगपतियों की सरकार है इस सरकार में स्वास्थ्य सेवाएं शिक्षा के क्षेत्र घोर अनियमितता हुआ है
 प्रश्न :लोकसभा की कोल्हान  की सीटों को लेकर आप क्या कहना चाहेंगे
उत्तर: लोकसभा चुनाव में कोल्हान की दोनों सीटों पर कांग्रेस मजबूती के साथ चुनाव लड़ेगी और विजय हासिल करेगी
प्रश्न: लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनाव की तैयारी भी पार्टी अभी से कर रही है क्या?
उत्तर: सवाल चुनाव का नहीं है सवाल है जनता के हित की रक्षा कैसे की जाए कांग्रेस पार्टी जनता की पार्टी है और जनता के हित के लिए कांग्रेस हमेशा से खड़ा रही है
प्रश्न: क्या आप भी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं
उत्तर :कुछ सोच कर देखिए अभी उचित समय नहीं है इस पर कुछ बोलने का परंतु आलाकमान का आदेश शिरोधार्य है पार्टी अगर खुद जवाबदेही देगी तो उस पर खरा उतरने का प्रयास करूंगा
 
 
 

Wednesday, 6 February 2019

विधानसभा: घपलों का अड्डा

कड़वा सच...
  पावर के नशे में किस प्रकार कोई भी काम आसानी से किया जा सकता है, यह झारखंड विधानसभा के अध्यक्ष व वहां तैनात रहे अधिकारियों से सीख सकता है। बशर्ते, सरकार व सरकारी अधिकारी राज्य के विकास की दलीलें देते रहें, लेकिन विधानसभा में कड़ी-दर-कड़ी जिस तरह के घपले सामने आ रहे हैं,  उसने सभी को हैरत में डाल दिया है।  उच्च पदों पर बैठे अधिकारी अपनी जेब भरने व अपने लोगों को फायदा देने के लिए कैसे नियमों को दरकिनार कर देते हैं, इसका बड़ा उदाहरण विधानसभा में हुई घपलेबाजी है।
 चाहे वह भत्तों के वितरण को लेकर बरती गई अनियमितता हो या फिर नियमों की अनदेखी कर बाहरी लोगों की भर्ती का मामला हो। वहीं, प्रोन्नति में आरक्षण के नियमों की अनदेखी से लेकर बिना अनुभव के लोगों को बड़ी जिम्मेदारी देने का मामला क्यों न हो। ऐसे मामलों की फेहरिस्त और भी लंबी है। इन घोटालों के सामने आने के बाद बजट सत्र बहुत हंगामेदार होने की प्रबल संभावना है। विपक्षी इन सब मामलों को लेकर जहां सरकार को घेरने की पूरी कोशिश करने की तैयारी में जुटे हुए हैं, वहीं सरकार किस प्रकार अपना बचाव करेगी, यह अपने-आप में बड़ा मुद्दा है।

गुरुदत्त दायित्व भत्ता
गुरुदत्त दायित्व भत्ते के वितरण में अनियमितता बरतने के लिए विधानसभा में तैनात अधिकारियों ने तो कमाल कर दिया। फेरबदल की ऐसी तरकीब निकाल डाली कि कुल 98 लाख रुपए का घोटाला कर डाला। दरअसल, इससे संबंधित पत्रावली में जहां-जहां अवर सचिव लिखा गया था, वहां पर अवर को वाइटनर के प्रयोग से मिटा दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि गुरुदत्त दायित्व भत्ता, जो अवर सचिव स्तर के अधिकारियों तक ही मिलता था, उसे सचिव स्तर तक कर दिया गया, क्योंकि सचिव के आगे लिखे अवर शब्द को वाइटनर से मिटा दिया गया। इस फेरबदल की वजह से लगभग 98 लाख रुपए का गलत तरीके से भुगतान अवर सचिव से अपर सचिव स्तर तक के अधिकारियों तक को किया गया। इस घाटाले की जांच में जुटी न्यायिक जांच आयोग ने तत्कालीन सचिव श्री अमरनाथ झा को दोषी माना है और उनसे 98 लाख रुपए वापस करने की मांग की गई है।



बाहरी लोगों की दी नियुक्ति
झारखंड विधानसभा सचिवालय में जमकर आरक्षण नीति का उल्लंघन भी किया गया और राज्य के बाहर के लोगों को नियुक्ति दी गई। ऐसा अधिकारियों ने अपने लोगों को भर्ती करने के लिए किया। झारखंड की आरक्षण नीति के अनुसार झारखंड राज्य से अलग किसी भी जाति एवं व्यक्ति को आरक्षण का लाभ देय नहीं है, लेकिन झारखंड विधानसभा सचिवालय में कुल 19 लोगों को गलत आरक्षण देकर नियुक्त कर दिया गया। इस मामले में खुलेतौर पर झारखंड राज्य के लोगों के अधिकारों का हनन किया गया, जबकि ऐसे पदों पर राज्य के लोगों का ही हक था। इनमें मुख्य रूप से निजी सहायक पद पर जैकी अहमद व संजय कुमार की नियुक्ति की गई। ये दोनों बिहार राज्य के निवासी हैं। यहीं नहीं, ओबीसी के तहत आरक्षण का लाभ देते हुए भी नियुक्तियां दी गईं। उसी तरह अनुसेवक में मुन्नी लाल सोरेन, प्रेमलता मरांडी, रेणु गुप्ता की तैनाती की गई। ये सब भी बिहार के रहने वाले ही हैं और इन्हें भी आरक्षण का लाभ देने के नाम पर तैनात किया गया। न्यायिक जांच आयोग ने जांच के क्रम में कुल 19 ऐसे लोगों को गलत तरीके से आरक्षण का लाभ देते हुए नियुक्त किया गया है, उन्हें बर्खास्त करने की अनुशंसा की है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी ऐसे लोगों का बर्खास्त करने का आदेश दिया है।


विज्ञापन सेवा शर्तों का उल्लंघन
घोटालों की फेहरिस्त में विज्ञापन सेवा शर्तों की अनदेखी का मामला भी जुड़ा है। असल में, यह मामला नियुक्ति के संबंध में निकाले गए विज्ञापन में सेवा शर्तों का खुलेआम उल्लंघन से जुड़ा हुआ है। हैरानी की बात यह है कि नियुक्ति के लिए भरे गए मूल आवेदन की छटनी में भी अनियमितता बरती गई। इसके तहत राजनेताओं के करीबी विधानसभा अध्यक्ष के क्षेत्र के लोगों को बहाल कर दिया गया। जैसे प्रतिवेदन के लिए नियुक्ति के लिए अशुलिपि की गतिसीमा संबंधी प्रभाव-पत्र नहीं रहने के बावजूद भी इंदर सिंह नामधारी के गृह जनपद पलामू के नौ लोगों का चयन कर दिया गया। आलम यह है कि राज्य विधानसभा में काम कर रहे 29 प्रतिवेदकों में 10 के पास आज तक आशुलिपि गतिसीमा, जो विज्ञापन में मांगी गई थी, उससे संबंधित प्रभाव-पत्र ही नहीं है और वे आज द्वितीय श्रेणी के अफसर बने हुए हैं। इस घपले में कई लोगों के नाम सामने आए हैं। और न्यायिक जांच आयोग ने नियुक्ति के लिए भरे गए मूल आवेदन की गलत छटनी करने वाले विधानसभा के अधिकारियों एवं कर्मचारियों को बर्खास्त करने की अनुशंसा की है, इनमें संयुक्त सचिव राम सागर, रवीन्द्र कुमार सिंह, तेज नारायण पाण्डेय एवं श्री अहमद अप्सानो अंजुम आदि शामिल हैं, जिन्हें बर्खास्त करने की अनुशंसा की गई है। इसके इतर तकनीकी पदों पर ऐसे लोगों को बहाल कर दिया गया, जो संबंधित योग्यता ही नहीं रखते थे। जैसे प्रतिवेदक में 10 लोग, जिनका आशुलिपि संबंधित प्रभाव-पत्र है ही नहीं तथा 29 में से 12 लोगों को अशुलिपि में शुन्य अंक प्राप्त हैं, फिर भी उन्हें प्रतिवेदक के पद पर बहाल कर लिया गया, जबकि प्रतिवेदक का मुख्य कार्य आशुलिपि ही है।
उधर, झारखंड विधानसभा सचिवालय में कुल अनुसेवक के 199 तथा माली मेहतर फरर्स एवं दरबान के 92 पदों के लिए साक्षात्कार हुए, जिसमें अनुसेवक के कुल 199 पदों के लिए साक्षात्कार समिति के सभी पांचों सदस्यों द्वारा अलग-अलग दिए गए अंकों में वाइटनर लगाकर अंकों को बढ़वा दिया गया। मजे की बात यह है कि कुल 199 चयनित अनुसेवकों में से 101 तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के गृह जनपद के निवासी हैं। वैसे ही, पद्वति प्रतिवेदक तथा निजी सहायक की नियुक्ति हेतु साक्षात्कार लिया गया, लेकिन बिना किसी अनुभव वाले व्यक्ति को मन मुताबिक नंबर देकर उनका चयन किया गया।
प्रोन्नति को लेकर घपला
प्रोन्नति में आरक्षण के नियमों का पालन नहीं किए जाने वाले मामले ने भी सभी को हिलाकर रख दिया। हैरानी की बात यह है कि इसमें पात्रता सूची को ही ठीक ढंग से तैयार नहीं किया गया और मन चाहे लोगों को प्रोन्नति दे दी गई। आश्चर्यजनक बात यह है कि लगभग 18 साल बीत जाने के बाद भी झारखंड विधानसभा सचिवालय में कोई भी वरीयता सूची नहीं बनी है। झारखंड विधानसभा में किसी भी पद पर सरकार द्वारा निर्धारित प्रोन्नति में आरक्षण नियम का पालन नहीं किया गया। जैसे प्रतिवेदक में वरीय प्रतिवेदक के पद पर प्रोन्नति में चतुर्थ स्थान सामान्य श्रेणी के लिए होते हैं, लेकिन अनिल कुमार, जो ओबीसी श्रेणी में आते हैं, उन्हें सामान्य दर्शाते हुए प्रोन्नति दे दी गई। ठीक वैसी ही प्रक्रिया निजी सहायक आप्त सचिव की प्रोन्नति में भी अपनाई गई। वहीं, संजय कुमार को सामान्य दर्शाते हुए चतुर्थ स्थान पर प्रोन्नति दे दी गई, जबकि वह भी ओबीसी से आते हैं। अब जांच आयोग ने राज्य विधानसभा सचिवालय में दिसंबर 2004 से अब तक सभी पदों पर प्रोन्नत हुए अधिकारियों व कर्मचारियों को उनके मूल पद पर रखने करने की अनुशंसा की है, क्योंकि किसी भी परिस्थिति में उनकी प्रोन्नति जायज नहीं है। झारखंड विधानसभा नियमावली 2003 में किसी भी पद पर प्रोन्नति के लिए न्यूनतम कालावधि 2 वर्षों का उल्लेख है, लेकिन विधानसभा में लगभग कोई भी कर्मी, जो अधिकारी बन बैठे हैं, उन्होंने अपने किसी भी पद पर दो वर्षों की सेवा पूर्ण नहीं की है।
झारखंड विधानसभा सचिवालय में चतुर्थ एवं तृतीय श्रेणी के पद पर प्रोन्नति, जो समिति प्रतियोगिता परीक्षा के आधार पर होनी चाहिए थी, उसका उल्लंघन किया गया और तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी ने कुल 17 ऐसे लोगों को चतुर्थ श्रेणी एवं तृतीय श्रेणी में प्रोन्नति दे दी, जो किसी भी प्रतियोगिता परीक्षा में बैठे ही नहीं और उनकी शैक्षिक योग्यता तृतीय संवर्ग पद के लायक भी नहीं थी। संचिका पर इंदर सिंह नामधारी द्वारा उनकी शैक्षणिक योग्यता को गौण करते हुए अनुभव के आधार पर कुल 17 लोगों को प्रोन्नति दे दी। जैसे कि अमीर दास तथा वीरेन्द्र कुमार। तृतीय श्रेणी में सहायक पद पर हुई समिति प्रतियोगिता परीक्षा में ये फेल थे, फिर भी उन्हें सहायक के पद पर प्रोन्नति दे दी गई। न्यायिक जांच आयोग ने अपनी जांच में पाया है कि जो तृतीय और चतुर्थ श्रेणी के 17 लोगों को प्रोन्नति दी गई है, वह गलत है। यही नहीं, उन्हें डिमोट करने की अनुशंसा के साथ-साथ प्रोन्नति देने वाले अधिकारियों एवं अध्यक्ष को दोषी मानते हुए उन पर राज्यपाल से कार्रवाई की अनुशंसा भी की है।
                                                         क्रमश...

सियासी हलचल ने बढ़ाई आशंका

जम्मू-कश्मीर: सियासी हलचल ने बढ़ाई आशंका जम्मू-कश्मीर में अमरनाथ यात्रियों पर अडवाइजरी और हजारों जवानों की तैनाती के बाद राज्य में जिस प्रका...