Tuesday, 19 April 2022

प्रोत्साहन राशि मामला :सवालों के घेरे में स्वास्थ्य विभाग और उनके अधिकारी

स्वास्थ्य मंत्री के न्यायिक प्रक्रिया का सहारा लेने से सरयू राय के आरोप होंगे बेनकाब!

देवानंद सिंह

सरयू राय द्वारा कोरोनाकाल में स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता द्वारा अपने चहेतों को अवैध तरीके से प्रोत्साहन राशि का वितरण किए जाने के आरोप के बाद जिस तरह से सियासी माहौल गरमाया जा रहा है, उसमें विधायक सरयू राय शिथिल नजर आने लगे हैं। क्योंकि इस मामले में विधायक सरयू राय जिस तरीके से लगातार अपने बयान बदल रहे हैं, उससे साफ तौर पर लग रहा है कि उनके पास लगाए गए आरोप को कोई भी आधार नहीं है, जिससे एक अपने बयानों में लगातार परिवर्तन ला रहे हैं, जिससे यही स्पष्ट होता है कि वह स्वास्थ्य मंत्री को एक तरह से क्लीन चिट दे रहे हैं। उनके द्वारा लगाए गए आरोप का मजेदार पहलू यह है कि उन्होंने कहा था कि मंत्री और उनके पीए ने पैसा लिया था, लेकिन उनके द्वारा जारी प्रेस नोट में किसी का नाम नहीं है। यह बात अपने-आप में सरयू राय के आरोप को कमजोर करती है।



हर एक व्यक्ति के मन में यह सवाल भी उठ रहे हैं कि

आखिर कार्यालय की गुप्त कागजात विधायक सरयू राय तक कैसे पहुंच रहे हैं आरटीआई के माध्यम से यह संभव नहीं हो सकता है इतनी जल्दी विधायक सरयू राय को यह भी बताना चाहिए कि उनके कागजात का स्रोत क्या है? तभी जाकर उनके आरोप पर मुहर लग सकती है इस मामले में जो तीन सदस्यों की समिति स्वास्थ्य विभाग ने बनाई थी, उनका मौन रहना भी मामले में षड़यंत्र को दर्शाता है, आखिर इस समिति ने किस आधार पर स्वास्थ्य विभाग के अपर मुख्य सचिव अरुण कुमार सिंह, अलोक त्रिवेदी समेत अन्य अधिकारियो का नाम पात्रता सूची में जोड़ दिया? यदि वे लोग पात्र है तो फिर स्वास्थ्य मंत्री समेत अन्य सहयोगी क्यों पात्रता नहीं रखते? 

दूसरी तरफ स्वास्थ्य विभाग के गोपनीय डोकुमेंट्स लिक हो रहे है और अपर मुख्य सचिव की इस पर चुप्पी बहुत कोताहुल पैदा कर रही है, यहां जानना जरूरी होगा संकल्प में प्रोत्साहन राशि के पात्रता की जिम्मेदारी कार्यालय प्रधान को सुनिश्चित करना था और स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय प्रधान अपर मुख्य सचिव अरुण कुमार सिंह है न कि मंत्री, फिर आखिर किस मकसद से कार्यालय प्रधान ने अपात्र लोगों का सूची में से नाम नहीं हटाया? ये गलती है या कोई षड़यंत्र?

दबी जुबान से अब यह बात भी उठने लगी है कि मंत्री रहते सरयू राय ने अपने विभाग में कितने कार्य किए पूर्वी विधानसभा की जनता अब यह भी जानने का प्रयास करने लगी है कि पूरे झारखंड में सिर्फ स्वास्थ्य विभाग ही विधायक सरयू राय के निशाने पर क्यों है और मंत्री बन्ना गुप्ता ही निशाने पर क्यों?

इस मामले में कोई शक नहीं कि झारखंड की राजनीति के चाणक्य कहे जाने वाले विधायक सरयू राय को स्वास्थ्य के चाणक्य कहे जाने वाले बन्ना गुप्ता ने कानूनी नोटिस भेज कर मात दे दी है! क्योंकि जब सरयू राय ने उन पर घपले का आरोप लगाया था, स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने साफतौर पर कह दिया कि अगर सरयू राय को लगता है कि प्रोत्साहन राशि के वितरण में कोई घपला हुआ है तो सरयू राय को या तो कोर्ट की शरण में जाना चाहिए या फिर किसी एजेंसी से जांच करा लेनी चाहिए। अगर, स्वास्थ्य मंत्री साफतौर पर कह रहे हैं तो वह निष्पक्ष जांच के लिए तैयार हैं तो फिर इसमें कोई लीपापोती का सवाल नहीं रह जाता है। सरयू राय मामले को लेकर कोर्ट जाएं या नहीं, लेकिन स्वास्थ्य मंत्री ने कोर्ट की शरण में जाने की बात कह दी है, जिससे लगता है कि आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सियासत चलती रहेगी। वैसे, गत दिनों में मामले को लेकर, जिस तरह विधायक सरयू राय की छीछलेदर हुई है, इस बात को वह भी खूब समझ रहे हैं कि उनके पास स्वयं द्वारा लगाए गए आरोप का कोई आधार नहीं है। लिहाजा, इस तरीके का आरोप वही लगा सकता है, जिसका स्वयं के काम में मन ना लगे। बेवजह मुद्दा उठाने से कुछ नहीं होगा। सरकार का और खुद सरयू राय का विधायक के रूप में चुनकर आए आधा समय बीत गया है, लेकिन विधायक अपने क्षेत्र में विकास के नाम पर कितने कार्य किए हैं इस पर भी उन्हें बोलना चाहिए बड़ा सवाल यह है कि जब उन्हें राज्य के विकास के मुद्दों को उठाना चाहिए, तब वह बिना हाथ-पैर के मुद्दे उठाकर क्या साबित करना चाहते हैं ? क्या जमशेदपुर पश्चिम विधानसभा की हार अब तक वे नहीं भूल पाए हैं?यह बात ठीक है कि हर किसी को सरकार और उसके मंत्रियों से सवाल पूछने का हक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि किसी को अनावश्यक बदनाम किया जाए। उन्होंने जिस तरह सोमवार को फिर एक नया खुलासा करते हुए कहा कि मंत्री बन्ना गुप्ता ने जिन 60 लोगों का कोविड प्रोत्साहन राशि लेने का आदेश दिया था, उनमें से 54 के बैंक खाता में डोरंडा ट्रेजरी से भुगतान हो गया है। लेकिन आश्चर्जनक बात यह है, जब इन सब चीजों के लिए कमेटी निर्धारण करती है तो मंत्री पर सवाल उठाने का क्या मतलब बनता है, एक प्रमुख अधिकारी पर सवाल नहीं उठाना भी सवाल के घेरे में है

जहां तक मंत्री की सुरक्षा में लगे 34 सुरक्षा कर्मियों का सवाल है, वो गृह मंत्रालय से संबंधित हैं और गृह सचिव और गृह मंत्री ही उनके वेतन को सूचित कर सकता है तो इस पर मंत्री को आरोपित करना सरयू राय के पूरे प्रकरण को हास्यास्पद बनाता है। यदि, मंत्री, स्वयं और उनके कर्मचारी प्रोत्साहन राशि की पात्रता नहीं रखते थे तो कार्यालय प्रधान होने के नाते सचिव अरुण कुमार सिंह ने उन लोगों का नाम सूची से क्यों नहीं हटाया ? अरुण कुमार सिंह जो अपर मुख्य सचिव स्वास्थ्य विभाग के हैं, वह जब सरयू राय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री थे तो उसके सचिव भी थे? इसीलिए, इस पूरे प्रकरण पर सरयू राय का पक्ष कमजोर पड़ता जा रहा है। बेवजह के मुद्दों को तूल देकर सियासी रोटियां सेंकने से बेहतर है कि वे राज्य के विकास पर बात करें। अगर, कोई मुद्दा है भी तो उसके पुख्ता सबूत होने चाहिए। स्वास्थ्य मंत्री ने इस पूरे प्रकरण में जिस तरह की गंभीरता दिखाई है और खुद को मंत्री के बजाय सामाजिक कार्यकर्ता बताया है, वह उनकी जननायक की छवि को प्रदर्शित करता है। जब उन्होंने खुद ही कह दिया है कि वह कानून की शरण में जाएंगे तो निश्चित ही पूरे प्रकरण का पटाक्षेप होगा।

कल पढ़ें :आखिर बन्ना ही निशाने पर क्यों

Friday, 15 April 2022

अनर्गल मुद्दों को उठाने बजाय क्षेत्र के विकास पर ध्यान दें सरयू राय

देवानंद सिंह

विधायक सरयू राय द्बारा स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता पर कोविडकाल में अवैध तरीके से अपने 60 लोगों को प्रोत्साहन राशि का वितरण के आरोपों के बाद झारखंड की राजनीति में एक बार सियासी गरमाहट आ गई है। सरयू राय ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर इस तरह का आरोप लगाया था, जिसके बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए वो सारे आकड़े सार्वजनिक किए हैं, जिसके तहत प्रोत्साहन राशि का वितरण किया गया। वहीं, स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने भी अपने बयान में सीधे तौर पर सरयू राय को चुनौती देते




 हुए कहा है कि उन्हें पत्र लिखने का क्या जरूरत थी, कोर्ट और एजेंसियों का दरवाजा खुला है। जांच कराई जाए, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। कुल मिलाकर, देखा जाए तो सरयू राय द्बारा लगाया गया आरोप यह कोई नई बात नहीं है। पिछले ढ़ाई के साल के दौरान उन्होंने काम कम और द्बेषपूर्ण तरीके से दूसरे नेताओं को कटघरे में खड़े करने की कोशिश की है, जो किसी भी रूप में जायज नहीं है। इससे पहले वह राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता रघुवर दास के खिलाफ अनावश्यक बयानबाजी देते रहे। उनके खिलाफ बेवजह मोर्चा खोला रखा। यानि जब से वह निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीतकर आए हैं, उनका ध्यान विकास के मुद्दों पर कम और रघुवर दास पर ज्यादा केंद्रित रहा। अब लगता है, जिस तरीके से अब वह स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता को टारगेट कर रहे हैं, उससे लगता है कि अब आने वाला ढ़ाई साल उनका इसमें बीतने वाला है। लेकिन इस बीच सबसे बड़ा सवाल है कि जिन मुद्दों को लेकर वह चुनाव जीतकर आए हैं, उनका क्या हुआ ? समाज से जुड़े ऐसे बहुत से मुद्दे थे, जिनको उन्होंने चुनाव जीतने के लिए मुद्दा बनाया था, लेकिन पिछले ढ़ाई साल में वह विकास की राजनीति के बजाय टारगेटेट राजनीति को ही आगे बढ़ाते रहे हैं। जब राज्य में विकास के मुद्दों को लेकर बात होनी चाहिए, तब इस तरह के अनर्गल मुद्दों को उठाकर क्या होगा, केवल जनता का ही नुकसान होगा। दूसरा, कोविडकाल में जिस तरह स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता सक्रिय रहे, उसने राज्य में कोरोना को फैलने से रोकने में अहम भूमिका निभाई। वह दिन-रात कोविड से जुड़ी सुविधाओं की मॉनिटरिंग कर रहे थे। खुद भी कोरोना पीड़ित हुए। एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार। जब कोरोनाकाल में स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य कर्मियों और दूसरे लोगों द्बारा किए गए अथक कार्यों की सराहना होनी चाहिए, तब इस तरह के आरोप लगाना बिल्कुल भी अनुचित है। अनुचित ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य कर्मियों का भी अपमान है। लिहाजा, जनता इस बात को भली-भांति देख रही है कि आखिर काम कौन कर रहा है और कौन अनर्गल के मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है। जब सरयू राय को यह देखने की जरूरत है कि उनके क्षेत्र में कितना काम हुआ है और वह किन मुद्दों को लेकर विधायक बने हैं, बेमतलब वह पहले रघुवर दास और अब स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता को बदनाम करने में लगे हुए हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि अनावश्यक मुद्दों को उठाकर वह भविष्य में चुनाव जीतने वाले नहीं हैं, बल्कि उन्हें भी अपने कार्यों का हिसाब देना होगा, क्योंकि चुनाव के दौरान जनता उनसे भी सवाल पूछेगी कि आखिर आपने पांच साल में किया क्या ? लोगों की उन समस्याओं का निस्तारण क्यों नहीं किया ? जिसको लेकर वह निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जनता के बीच में गए थे। इसीलिए इस पूरे मामले का निष्कर्ष यही निकलता है कि सरयू राय को पत्र लिखने के बजाय कोर्ट या फिर जांच एजेंसियों का दरवाजा खटखटाना चाहिए था, तभी तथ्य सामने आते। स्वास्थ्य मंत्रालय ने जब तथ्य सार्वजनिक कर दिए हैं तो वह अपने आरोपों को किस तरह सिद्ध कर पाएंगे, जनता तो अब यह कहने लगी है की ढाई साल पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के पीछे लगे रहे और ढाई साल स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता के पीछे लगे रहेंगे मालिकाना हक का मुद्दा कहां गया इस पर भी उन्हें विचार करना चाहिए। आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों को सिद्ध भी करना चाहिए। इसीलिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सरकार के अंदर फूट डलवाने का प्रयास करने के बजाय सरयू राय के लिए बेहतर होता कि वह कोर्ट की शरण में जाते, तभी कोई रिजल्ट निकल पाता। जब स्वास्थ्य मंत्रालय सारी चीजें स्पष्ट कर चुका है तो अब सरयू राय के लिए ज्यादा जरूरी होना चाहिए, क्षेत्र के विकास पर ध्यान देना, तभी जनता उन्हें माफ करेगी।

Friday, 1 April 2022

रघुवर दास और बन्ना गुप्ता की तस्वीर के सियासी मायने.....

 देवानंद सिंह                                                                                                                                             झारखंड के सियासी गलियारों में एक शानदार तस्वीर की खूब चर्चा हो रही है। चर्चा इसीलिए क्योंकि यह महज तस्वीर भर नहीं है, बल्कि राज्य की राजनीति में बदलते समीकरणों का भी एक पुख्ता संकेत है। दरअसल, जिस तरह हेमंत सोरेन सरकार में स्वास्थ्य मंत्री व राज्य के कद्दावर नेता बन्ना गुप्ता पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के बड़े नेताओं में शुमार रघुवर दास से मिले, उसे प्रेम की भाषा की राम-भरत की जोड़ी का मिलाप कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि बन्ना गुप्ता ने जो तस्वीर अपने ट्विटर हैंडल पर डाली, वह राम-भरत के मिलन



 की याद दिलाती नजर आ रही है। पर सियासी रूप से इसके कुछ और ही मायने है, क्योंकि बन्ना गुप्ता केवल स्वास्थ्य मंत्री भर नहीं हैं, बल्कि उस कांग्रेस पार्टी के नेता भी हैं, जो बीजेपी की धुर विरोधी है। और रघुवर दास इसी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं और बीजेपी कांग्रेस मुक्त भारत के अभियान में जुटी हुई है। इसीलिए बन्ना गुप्ता का रघुवर दास से मिलना कांग्रेस के लिए चिंताजनक तो कहा ही जा सकता है, बल्कि हेमंत सोरेन सरकार के लिए और भी चिंताजनक है, क्योंकि लगातार खबरें आ रहीं हैं कि हेमंत सोरेन सरकार के अंदर सबकुछ सही नहीं चल रहा है, कांग्रेस के विधायक तो बगावती तेवर अपनाए हुए ही हैं बल्कि झामुमो के भी कई विधायक बीजेपी के संपर्क में बताए जा रहे हैं, लेकिन अभी तक इस तरह की बातें छनकर सामने आ रहीं थीं, लेकिन अब बदलते राजनीतिक समीकरणों की तस्वीर जिस तरह खुले तौर पर सामने आ रही है, उससे राज्य के बदलते राजनीतिक समीकरणों के बारे में कयास लगाना गलत नहीं होगा। ऐसी स्थिति में फिलहाल यह कहना अभी मुश्किल लगता है कि आखिर राज्य का सियासी भूचाल आखिर कहां जाकर खत्म होगा। भले ही, सियासी गलियारों में चर्चा के ग्राम होने के बाद बन्ना गुप्ता ने इसे औपचारिक मुलाकात कहा। दरअसल, शुक्रवार को रघुवर दास की पोती का पहला जन्मदिन था, जिसमें खास मौके पर बच्ची को शुभकामना देने के लिए मंत्री बन्ना गुप्ता ने भी शिरकत की। इसके बाद उन्होंने रघुवर दास के साथ इस अंदाज में तस्वीर खिंचवाई, जिसकी चर्चा सियासी गलियारों में तो हुई ही, बल्कि आम लोग भी तस्वीर के लेकर चर्चा करते नजर आए। सोशल मीडिया में इस तस्वीर को लेकर बहुत-कुछ कहा जा रहा है, क्योंकि पक्ष विपक्ष के लोग समय-समय पर मिलते रहते हैं, लेकिन रघुवर दास और बन्ना गुप्ता के मिलन की यह तस्वीर ऐसे वक्त में सामने आई है, जब हेमंत सोरेन सरकार को गिराने के प्रयासों की खबर लगातार



 आ रही है। बन्ना गुप्ता सरकार में मंत्री हैं, लेकिन भाषाई विवाद को लेकर बन्ना गुप्ता काफी मुखर रहे हैं। उन्होंने पिछले दिनों काफी कड़क बयान दिए थे, जिसमें उन्होंने कहा था, भाषा और मां भारती के लिए वह एक बार नहीं हजार बार अपना पद कुर्बान कर सकते हैं, तभी से हेमंत सोरेन सरकार के अंदर हलचल तेज नजर आ रही है। झामुमो के विधायकों के भी बीजेपी के संपर्क में रहने की बात सामने आ चुकी है, पिछले साल भी इस तरह के घटना सामने आ चुकी है। ऐसे में राज्य के राजनीतिक गलियारों में काफी उथल पुथल है। बन्ना गुप्ता का जिस तरह भगवा प्रेम सामने आ रहा है, वह इस चर्चा को और गरम कर रहा है। केवल रघुवर दास के साथ मुलाकात से ही उनका भगवा प्रेम देखने को नहीं मिला है, बल्कि डिमना चौक से हिंदू नव वर्ष के अवसर पर निकाली गई शोभा यात्रा का हिस्सा भी बन्ना गुप्ता बने। यह शोभा यात्रा पूरी तरह भगवा मय थी। और यह शोभा यात्रा भी रघुवर दास के किसी करीबी के नेतृत्व में निकाली गई। इस अवसर पर बन्ना गुप्ता ने भगवान राम को आस्था का प्रतीक बताया। इस दौरान स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता के हाथ में भगवा झंडा भी था और वह सिर पर भगवा पगड़ी पहने और पूरी तरह भगवा रंग से सराबोर नजर आ रहे थे। बन्ना बोले- राम हमारे आस्था के प्रतीक हैं, राम का नाम मात्र लेने से शरीर में नई ऊर्जा का संचार होता है। मर्यादा पुरुषोत्तम राम पुरुषार्थ के प्रतीक हैं, हमारे गौरव हैं, हम सबके हैं। सभी राज्यवासियों को हिन्दू नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं। यह यह बता दें कि इससे पहले बन्ना



 गुप्ता इस तरह के कार्यक्रम में शामिल होने से परहेज करते थे, लेकिन संभवत: यह पहला मौका था,जब बन्ना गुप्ता हिन्दू नव वर्ष शोभा यात्रा में शामिल हुए हैं। राज्य में जिस तरह का राजनीतिक घटनाक्रम जन्म ले रहा है, उसमें आने वाले दिन राजनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण होंगे। सीएम हेमंत की भाभी सीता सोरेन भी कुछ दिनों से देवर से कुछ अधिक ही नाराज दिख रही हैं। कभी अपनी बात को लेकर सीएम हेमंत से मिलती हैं तो कभी गुरुजी शिबू सोरेन से। अब अपनी सरकार की शिकायत लेकर सीता सोरेन राज्यपाल तक पहुंच गईं हैं। जब वो वहां से निकलीं तो कहा कि मेरे खिलाफ साजिश हो रही, मेरी आवाज को दबाने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने कहा कि अब इस सरकार से कोई उम्मीद नहीं बची है, लिहाजा, बन्ना गुप्ता हों या लोबिन हेंब्रम या सीता सोरेन या फिर कोई और विधायक, कोई भी हेमंत से साथ स्थायी तौर पर हमेशा के लिए जुड़े रहेंगे या नहीं..यह कहना काफी मुश्किल भरा लग रहा है।

द्रोपदी मुर्मू बन सकती हैं देश की अगली राष्ट्रपति !2024 को साधने के लिए आदिवासी और महिला कॉम्बिनेशन का समीकरण सेट करना चाहती है बीजेपी

देवानंद सिंह देश में 16वें राष्ट्रपति के लिए चुनाव को लेकर सरगर्मी तेज है। अगले महीने 18 जुलाई को चुनाव होना है। इसके लिए नामांकन दाखिल करने...