Saturday, 24 July 2021

क्या फिर सिंह-इज-किंग बनकर उभर पाएंगे कैप्टन अमरिंदर सिंह ?

देवानंद सिंह

पंजाब कांग्रेस में लंबे घमासान के बाद जिस तरह नवजोत सिंह सिद्घू को पार्टी अध्यक्ष बना दिया गया है, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला, इतिहास ने स्वयं को दोहराया तो है ही, दूसरा महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या पंजाब में कैप्टन को साइडलाइन करने की तैयारी शुरू हो चुकी है और तीसरा सवाल यह है कि क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह पूर्व की तरह ही इस राजनीतिक उठा-पटक के बीच एक बार फिर सिंह-इज-किंग बनकर उभर पाएंगे? 



दरअसल, 7 महीने बाद देश के जिन 5 राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें पंजाब भी शामिल है। अगर, आगामी चुनावों को लेकर सियासत सबसे अधिक गर्म है तो यूपी के बाद पंजाब ही ऐसा राज्य है, जिस पर सबकी नजर टिकी पड़ी हैं। कांग्रेस के सामने सत्ता में आने की चुनौती होगी, तो कांग्रेस से थोड़ा पीछे आम आदमी पार्टी भी इस बार बाजी मारने की हर संभव कोशिश करेगी। वहीं, बीजेपी तो देश की सबसे बड़ी है ही, इसीलिए वह भी चाहेगी कि हर हाल में पंजाब को फतह किया जाए। अकाली और बीजेपी की राहें इस बार जुदा होने की वजह से भी आगामी चुनावों में क्या समीकरण बनेगा, यह देखना बेहद ही दिलचस्प होगा।

 जहां तक कैप्टन-सिद्घू के घटनाक्रम ने इतिहास को दोहराने का सवाल है। शायद, बहुत कम लोगों को साल 2015 का घटनाक्रम याद हो। जब यहां कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कई विधायकों का समर्थन लेकर कांग्रेस हाई कमान पर दबाव बनाया था और प्रताप सिंह बाजवा को पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटवा कर पार्टी की कमान अपने हाथों में ली थी, आज नवजोत सिंह सिद्घू ने भी वही किया। यानि उसी इतिहास को दोहराया है। आलाकमान से सिद्घू को हरी झंडी मिलने के बाद विधायकों और संभावित उम्मीदवारों को ये लगने लगा है कि सिद्घू उन्हें 2022 के विधानसभा चुनावों में अपनी सीट जीतने में मदद कर सकते हैं, यही वजह है कि जो कल तक कैप्टन को सलाम किया करते थे, आज वे नवजोत सिह सिद्घू के साथ मिलकर 'आगामी रणनीति का फलसफां लिख रहे' हैं। 2015 में भी ठीक ऐसा ही हुआ था, तब भी विधायकों का मानना था कि उन्हें जीत की ओर अमरिंदर सिंह ही ले जा सकते हैं न कि प्रताप सिंह बाजवा। आलम यह था कि कैप्टन अमरिंदर सिंह को पार्टी विधायकों और अन्य वरिष्ठ नेताओं से इतना समर्थन प्राप्त हुआ कि बाजवा अलग-थलग पड़ गए थे और आलाकमान को उन्हें बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा था। 

ऐसे में, क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह आलाकमान के इस फैसले को इसी तरह स्वीकार करेंगे, या फिर वह कुछ और बड़ी सियासत को लेकर सामने आएंगे। क्योंकि हमें 2015 की तरह 2017 के घटनाक्रम को भी नहीं भूलना चाहिए, जब कैप्टन अमरिंदर सिंह सिह इज किंग बनकर उभरे थे। लिहाजा, इस बार भले ही अपनी पार्टी में कैप्टन की ना चली हो, लेकिन इसी कैप्टन ने कांग्रेस को 5 साल पहले ऐसे मौके पर पंजाब में सत्ता दिलाई थी, जब यूपी समेत कई राज्यों में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा था। कुल मिलाकर, 2017 के इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने आम आदमी पार्टी के उभार के बीच बड़ी जीत हासिल की थी। कांग्रेस ने कैप्टन के नेतृत्व में 117 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए 77 सीटों पर जीत का परचम लहराया था। पार्टी को 38.5 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। संगठन के दिग्गज खासकर पार्टी प्रधानों से हमेशा से ही कैप्टन का 36 का आंकड़ा रहा है। बावजूद इसके 41 साल के अपने राजनीतिक सफर में पहले भी वह कई मुश्किल दौर से उबर चुके हैं, ऐसे में, सिद्घू को प्रदेश की कमान सौंपने के साथ ही कैप्टन अमरिंदर सिंह पंजाब में दूसरी पारी खेल पाएंगे ? क्या वह इस बार भी पिछला करिश्मा दोहरा पाएंगे ? यह सवाल सबसे अधिक महत्वपूर्ण है।

Thursday, 22 July 2021

क्या घर वापसी करना चाहते हैं सरयू राय !

देवानंद सिंह

क्या विधायक सरयू राय घर वापसी के लिए बेताब हैं ? यानि फिर से वह भाजपा में आने के लिए बिलबिला रहे हैं। अगर, ऐसा नहीं है तो फिर उनकी हर गतिविधियां भाजपा के इर्द-गिर्द क्यों घूम रही हैं ? अपनी पार्टी भारतीय जनतंत्र मोर्चा बनाने के बाद भी वह भाजपा हाईकमान के नेताओं के साथ घुसपैठ की कोशिश क्यों कर रहे हैं और भाजपा के जो भी घोषित कार्यक्रम हैं, उन्हें अपनी पार्टी के बैनर तले क्यों मना रहे हैं ? जी हां, उनकी ऐसी ही गतिविधियों से राजनीतिक गलियारों में इसी तरह के तमाम सवाल तैर रहे हैं। यह आश्चर्यजनक है कि वह पूर्व मुख्यमंत्री रघुवरदास और उनके समर्थकों के खिलाफ बगावती तेवर दिखाते रहे हैं। इसमें शक नहीं कि उन्होंने निर्दलीय उम्मीद के रूप में रघुवर दास को जमशेदपुर पूर्वी विधानसभा सीट से हराया है। पर जनता ने उन्हें जिताया है तो इस बात के लिए कि वह उनके लिए कुछ काम करें, लेकिन वह जिस तरह से विकास के कार्यों को भूलकर रघुवर दास और उनके समर्थकों के खिलाफ आरोप लगा रहे हैं, उससे जनता के बीच भी यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या उन्हें इसीलिए जिताया गया है कि वह जनता के लिए विकास कार्यों पर ध्यान देने के बजाय दुष्प्रचार भरी राजनीति को बढ़ावा दें ? क्यों वह जनता के मुद्दों को भूलकर सिर्फ रघुवर दास और उनके समर्थकों के खिलाफ मौहाल बनाने तक सीमित रह गए हैं ? उन्हें विधायक बने दो साल होने को हैं, इसके बाद भी उनके क्षेत्र में विकास का कोई भी कार्य नजर नहीं आ रहा है। विकास के लिए जो उद्घाटन और शिलान्यास हुए हैं उसमें से अधिकतर रघुवर कार्यकाल के ही हैं यह बहुत ही अजीब बात है कि एक तरफ तो



वे पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के साथ तकरार का माहौल बनाए हुए हैं दूसरी तरफ प्रदेश भाजपा के साथ व भाजपा केंद्रीय कार्यकारिणी और आरएसएस लॉबी से गलबहियां करने में जुटे हुए हैं। जिससे भी यह साबित होता है कि वह राजनीति जनता की सेवा के लिए नहीं कर रहे हैं! बल्कि अपने स्वार्थ को पूरा करने के लिए कर रहे हैं। ऐसा लगता है कि जिस तरह से आज के दौर में चुनाव महंगे हो गए हैं और पार्टी का संचालन आसान नहीं है, ऐसे में उन्हें लगता है कि घर वापसी से ही उनका उद्घार हो सकता है कि इसीलिए हाल के दिनों में जब वह दिल्ली गए थे तो वह आरएसएस के साथ ही भाजपा के नेताओं के साथ भी मिले थे और उन्हें स्वयं द्बारा लिखी किताबें-लम्हों की खता और रहबर की रहजनी की प्रतियां दी थीं। पर यहां भी सवाल खड़ा होता है कि उनका भाजपा के साथ यह कैसा लगाव है। मान लेते हैं कि भाजपा से उनका पुराना नाता है तो फिर वह भाजपा प्रदेश कार्यकारिणी को बिना किसी वजह बदनाम करने की कोशिश क्यों कर रहे हैं ? जिन पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने उन्हें अपनी सरकार में महत्वपूर्ण मंत्रालय दिया था, उनके खिलाफ प्रदेश में माहौल क्यों बनाया जा रहा है। क्या उनका मकसद सिर्फ रघुवर दास को बदनाम करना है? चाहे उसके लिए उन्हें किसी भी हद तक जाना पड़े। ऐसी परिस्थितियों में अगर, वह घर वापसी करते भी हैं तो उनकी दाल गलेगी कैसे ? क्योंकि पूरी प्रदेश कार्यकारिणी में वह किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होंगे। जिस तरह से उन्होंने राज्य में भाजपा को बदनाम किया है, उससे नहीं लगता है कि उन्हें किसी भी प्रकार का समर्थन केंद्रीय कार्यकारिणी और प्रदेश कार्यकारिणी की तरफ से मिलेगा। लिहाजा, सरयू राय को यह समझना चाहिए कि जनता ने जिस मुख्यमंत्री रघुवर दास को दनकिनार कर उन्हें वोट देकर जिताया है, कम-से-कम वह उनके बारे में तो सोचें। दुश्मनी की राजनीति छोड़कर राजनीति के लिए मिसाल पेश करें और विकास पर अपना ध्यान लगाएं, तभी क्षेत्र की जनता उन्हें माफ करेगी। भाजपा से अलग होकर पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने भी झारखंड विकास मोर्चा का गठन किया था उसका हश्र भी झारखंड की जनता ने देखा है उससे भी विधायक सरयू राय को सबक लेने की जरूरत है

Wednesday, 21 July 2021

किसानों की मौत, बेरोजगारी, महंगाई के साथ जनता के दर्द की भी जासूसी करे सत्ता पक्ष और विपक्ष

देवानंद सिंह

पेगासस जासूसी मामले में केंद्र सरकार पूरी तरह घिरती हुई नजर आ रही है। वहीं, विपक्ष भी इस मुद्दे को भुनाने में बिल्कुल भी पीछे नहीं है, जिस तरह इस मामले की परतें खुल रही हैं और पक्ष व विपक्ष के कई नेताओं के नाम सामने आए हैं, उससे ऐसा लगता है कि संसद का यह सत्र भी इसी विरोध की भेंट चढ़ने वाला है। यानि, इस घटनाक्रम के बाद एक बात तो तय हो गई है कि किसानों की मौत, बेरोजगारी और महंगाई की बात होने वाली नहीं है। यहां राजनीति के अलावा कुछ नहीं हो रहा है। अगर, देश की इतनी ही चिंता है तो क्यों किसानों की मौत, बेरोजगारी व महंगाई के साथ ही जनता के दर्द की जासूसी भी की जाए। सत्तारूढ़ पार्टी को जहां इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, वहीं विपक्ष को इन्हीं मुद्दों का बेबाकी से उठाना चाहिए, जिससे जनता के बीच यह मैसेज जाए कि राजनीतिक मंच पर कोई उनकी चिंता करने वाला है। 



पर आज के दौर में केवल महत्व दिया जा रहा है तो चुनावी मुद्दों को। सरकार ने किसानों और रोजगार के मामले में जैसा काम किया है, उस पर तो वह बिल्कुल भी चर्चा नहीं करना चाहेगी, पर विपक्ष को तो ये चीजें नहीं भूलनी चाहिए। एक मजबूत विपक्ष के रूप में उसे इन मुद्दों को उठाना चाहिए, जिससे सरकार अपनी मनमानी करने से बाज आए और देश में इन नेताओं की तरह किसान, मजदूर भी चैन की जिंद्गी जी सके। पर ऐसा कैसे संभव होगा, जब तक जनप्रतिनिधि ही इस तरफ ध्यान नहीं देंगे। 



आज देश के हालात बद से बदत्तर हो गए हैं। लोग प्राथमिक चीजों के लिए कराह रहे हैं। महंगाई इतनी बढ़ा दी गई है कि लोगों के लिए जीवन चलाना मुश्किल हो गया है। एक तरफ, बेरोजगारी का आलम है और दूसरी आसमान छूती महंगाई। या तो आप रोजगार दो, या फिर महंगाई कम करो। पर सरकार न तो रोजगार दे रही है और न ही महंगाई कम कर रही है, इसमें लोगों के जीवन की बेहतरी की उम्मीद कैसे कर सकते हैं। सच यह है कि लोगों को समझ ही नहीं आ रहा है कि इस खराब परिस्थिति का सामना कैसे किया जाए ? 2 करोड़ लोगों को रोजगार देने की बात कहकर बीजेपी सत्ता में आई थी, लेकिन रोजगार की बात तो छोड़िए, कोरोना काल में करोड़ों लोगों ने अपने रोजगार खोए हैं, लेकिन सरकार इस पर कुछ भी बोलने तक को तैयार नहीं है। आलम यह है कि बेरोजगारी दर 40 सालों के सबसे निचले स्तर पर आ गई है, उसके बाद भी न तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और न ही उनके मंत्री जमुलेबाजी से बाज आ रहे हैं। 




किसानों के मुद्दों पर भी सरकार कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। किसानों के विकास के लिए किए गए अपने वादे से ही सरकार भटक गई है। किसानों की आय दोगुनी करने की बात कही गई थी, लेकिन सरकार का कोई भी नुमाइंदा यह तो बताए कि आखिर किसानों की आय कहां दोगुनी हुई है ? अगर, किसानों की आय दोगुनी होती तो क्या वे आंदोलन करते ? क्या देश का किसान आत्महत्या के लिए मजबूर होता। किसानों द्बारा लगातार आत्महत्या किए जाने के मामले बढ़ रहे हैं, लेकिन सरकार किसानों के मुद्दों पर चर्चा करने तक को राजी नहीं है। ऐसे में, सवाल उठता है कि मोदी सरकार आखिर कैसे भारत की कल्पना कर रही है।




 क्या ऐसे भारत की, जहां का युवा बेरोजगार हो और किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर हो। अगर, ऐसे भारत की कल्पना नहीं कर रही है तो फिर क्यों देश के अंदर बेरोजगारी बढ़ रही है ? क्यों देश का युवा बेरोजगार है ? और क्यों देश का किसान आत्महत्या करने के लिए मजबूर है ? अगर, मोदी सरकार को देश की चिंता ही है तो क्यों देश में लगातार महंगाई  बढ़  रही है। पेट्रोल, डीजल से लेकर आम इस्तेमाल की चीजें इतनी महंगी क्यों हो रही हैं ? इन सवालों का निश्चित ही सरकार को जबाब खोजना चाहिए और विपक्ष को सरकार के समक्ष ये सवाल रखने चाहिए, तभी यह माना जाएगा कि देश में आज आमजनता के बारे में कोई चिंता करने वाला है।


Tuesday, 13 July 2021

संघ का चुनावी स्टंट

देवानंद सिंह 

पश्चिम बंगाल में चुनाव हारने व कोविड-19 महामारी के बाद गिरते ग्रॉफ को देखते हुए भाजपा को उत्तर-प्रदेश  सहित कई राज्यों में होने वाले चुनावों की चिंता सताने लगी है, इसी वजह से संघ भी चुनावी गियर में नजर में आने लगा है। बहुत-सी ऐसी परिस्थितियां नजर आ रही हैं, जिसमें संघ आगे बढ़कर न केवल चीजों को मैनेज करने में जुटा है, बल्कि पार्टी के अंदर भी सामंजस्य बनाने की कोशिश कर रहा है, जिससे अगले साल होने वाले चुनावी रण में बाजी मारी जा सके। उत्तर-प्रदेश पर विशेष फोकस किया जा रहा है, क्योंकि उत्तर-प्रदेश के रास्ते ही 2024 में दिल्ली का रण फतह होना है, इसीलिए पिछले कुछ दिनों से उत्तर-प्रदेश में संघ की सक्रियता खूब देखी जा रही है वह इसी का नतीजा था। इसके बाद जो एक और महत्वपूर्ण बात है, वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान, जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत में इस्लाम को कोई खतरा नहीं है। इसीलिए मुसलमानों को ऐसेे किसी डर में नहीं रहना चाहिए। सभी भारतीयों का डीएनए एक है। उन्होंने लिंचिंग की भी निंदा की और कहा कि ऐसा करने वाले हिंदुत्व के खिलाफ हैं। 



अभी संघ प्रमुख ने यह बात क्यों की, इसे समझना बहुत अधिक मुश्किल नहीं है। यूपी का राजनीतिक गणित जातीय समीकरणों से बंधा हुआ है, इसीलिए चुनावों में इसकी विशेष भूमिका होती है। इसमें मुस्लिम भी शामिल हैं, क्योंकि प्रदेश में लगभग 18 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जो चुनाव का परिणाम बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मोहन भागवत के बयान से साफ जाहिर होता है कि उन्होंने अपने बयान से मुस्लिम वोटरों को साधने का सीधा प्रयास किया है। हाल ही में, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी एआइएमआइएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को बड़ा नेता बताकर कुछ ऐसा ही प्रयास किया था। चलो मान लेते हैं कि योगी आदित्यनाथ राजनीतिक धारा से जुड़े हुए हैं, लेकिन संघ प्रमुख ने ऐसा क्यों किया ? जबकि वह स्वयं को सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन मानता है। संघ का यह पहला ऐसा स्टंट नहीं है। पहले भी जब-जब ऐसी परिस्थितियां पैदा हुईं हैं, संघ आगे आता रहा है। आगामी 2024 तक का सफर राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है, इसीलिए यूपी और केंद्र में सरकार बनाने के मिान में संघ पीछे कैसे रह सकता है। 

दरअसल, इसके पीछे की कहानी यह भी कि संघ की 2025 में शताब्दी महोत्सव आयोजित करने की योजना है। जाहिर सी बात है कि इससे पहले ही केंद्र में कोई भी नई सरकार बन जाएगी। यानि भाजना सत्ता में आती है तो इसके मायने कुछ अलग होंगे। हम यह भी कह सकते हैं कि 2025 में होने वाले शताब्दी महोत्सव की सफलता ही इस बात पर निर्भर करेगी कि केंद्र में भाजपा की सरकार है या नहीं। वर्तमान में जो हालात हैं, उस परिस्थिति में भाजपा के प्रति लोगों में थोड़ा रोष है, खासकर, कोरोना को नियंत्रित करने में सरकार जनता के उम्मीदों के अनुरूप काम नहीं कर पाई, इसीलिए संघ ने अपनी भूमिका को थोड़ा बढ़ा दिया है, इसीलिए हम सबने देखा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में संघ के पदाधिकारी जमीनी स्तर पर काम करते नजर आ रहे थे। अब अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर भी संघ पदाधिकारियों की सक्रियता बढ़ गई है। भाजपा नेता कहते भी हैं कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। यह भाजपा और पूरे संघ परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लिहाजा, विधानसभा चुनाव के नतीजों से 2024 के चुनावों की तस्वीर साफ होगी, इसीलिए संघ यहां कोई भी चूक नहीं करना चाहता है। उधर, योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जो माहौल बनाया जा रहा था, वह पंचायत चुनावों में बीजेपी  प्रतियाशियों की प्रचंड जीत से कम हुआ है। भाजपा और संघ के लिए यह अच्छी खबर है कि जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में उसे 75 में से 67 में जीत मिली है। प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के खाते में सिर्फ पांच सीटें आई हैं। वहीं, राष्ट्रीय लोकदल को एक सीट पर जीत मिली है। भाजपा की सफलता इसीलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसने समाजवादी पार्टी को उनके गढ़ मैनपुरी, रामपुर, बदायूं और आजमगढ़ में भी शिकस्त दी है। हालांकि, यह माना जा रहा है कि बसपा समर्थकों ने इन चुनावों में भाजपा के पक्ष में वोट दिया। इसके बावजूद भी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली के खिलाफ असंतोष की आवाज है। आरोप है कि पार्टी के विधायकों और मंत्रियों से ज्यादा वे अधिकारियों पर भरोसा करते हैं, ठाकुरों को ज्यादा तरजीह मिलती है, जबकि अन्य किनारे कर दिए गए हैं। कोरोना महामारी से निपटने के उनके तरीके की आलोचना के साथ असंतोष की आवाजें तेज हुईं। लिहाजा, भाजपा नेताओं के साथ कई बैठकों में संघ के पदाधिकारियों ने उन्हें दूसरे राज्यों में असंतोष दूर करने की सलाह दी और उत्तर प्रदेश में खुद हालात से निपटने का निर्णय लिया। इसीलिए पिछले दिनों उत्तर-प्रदेश में संघ नेताओं के दौरे होते रहे हैं।

जहां तक दूसरे राज्यों की बात है संघ की पृष्ठभूमि वाले भाजपा महासचिव अरुण सिंह को मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के समर्थन में कर्नाटक भेजा गया। वहीं, गुजरात में जहां पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सी.आर. पाटील और मुख्यमंत्री विजय रुपाणी आमने-सामने हैं, वहां असंतुष्ट विधायकों के साथ भाजपा के शीर्ष नेताओं ने बात की। मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में भी नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के बीच भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने स्थिति को संभाला, उससे पहले केंद्रीय नेतृत्व ने त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव कुमार देब के खिलाफ असंतोष को दबाया, हालांकि उत्तराखंड में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिह रावत को हटाने का फैसला लेना पड़ा। 

कुल मिलाकर संघ की नजर इन राज्यों पर भी है, और उत्तर प्रदेश पर भी। पर मुख्य फोकस तो उत्तर- प्रदेश पर ही है। भाजपा और संघ के शीर्ष नेतृत्व ने 23 मई को राज्य की स्थिति का जायजा लिया और महामारी की दूसरी लहर के असर की समीक्षा की। उस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबले और भाजपा के प्रदेश संगठन सचिव सुनील बंसल भी मौजूद थे। संघ में नंबर दो की हैसियत रखने वाले होसबले 24 से 28 मई तक उत्तर-प्रदेश में ही थे, जहां उन्होंने राज्यस्तरीय पदाधिकारियों के साथ विचार-विमर्श किया और योगी सरकार के प्रति फीडबैक लिया। ऐसी ही, एक बैठक में मौजूद रहने वाले संघ के एक नेता के अनुसार, कोविड-19 के कारण योगी सरकार की छवि को हुए नुकसान को लेकर वे काफी चितित थे। उन्होंने गंगा तट पर दफनाई गई और पवित्र नदी में बहाई गई लाशों के बारे में भी जानकारी ली।

बताया जा रहा है कि उसके बाद भी होसबले दो और बैठकें कर चुके हैं। प्रदेश भाजपा इकाई को यह संदेश गया है कि विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। संघ के उक्त पदाधिकारी ने बताया कि योगी हिदुत्व की मजबूत छवि वाले नेता हैं। सीएए विरोधियों, लव जिहाद कानून और अवैध बूचड़खाने बंद करने जैसे मुद्दों पर उनका रवैया संघ की विचारधारा के अनुरूप ही है। संघ नेता यह भी जानते हैं कि 2024 के चुनाव से पहले अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पूरा करने के लिए योगी ही सबसे योग्य व्यक्ति हैं। लिहाजा, संघ ने योगी और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच मध्यस्थ की भी भूमिका निभाई। मौर्य चाहते थे कि 20 22 के चुनाव में योगी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार न बनाया जाए। होसबले, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष और कृष्ण गोपाल समेत कई नेता योगी के साथ मौर्य के घर भोजन के लिए पहुंचे। संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के अनुसार, मतभेद दूर करने के लिए संघ सहभभोज और बैठक जैसी रणनीतियां अपनाता है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में पराजित होने के बाद वह यहां मौका नहीं गंवाना चाहता है।

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सक्रियता को असामान्य घटना मानते हैं संघ नेता

संघ की पृष्ठभूमि वाले एक वरिष्ठ भाजपा नेता के अनुसार यह कहना गलत होगा कि संघ उत्तर प्रदेश चुनाव को ध्यान में रखते हुए यह सब कर रहा है। वे कहते हैं, संघ ऐसा कुछ भी नहीं कर रहा, जो असामान्य हो। वह तो कोविड-19 के बाद राहत कार्यों में व्यस्त है। हालांकि इस नेता ने स्वीकार किया कि बंगाल चुनाव और उससे पहले 2018 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में संघ की सक्रिय भूमिका थी। उन्होंने कहा कि दोनों राज्यों में संघ के लिए लड़ाई राजनैतिक नहीं, बल्कि वैचारिक थी। बंगाल में लड़ाई मुस्लिम कट्टरपंथियों के खिलाफ तो त्रिपुरा में हिसक कम्युनिस्ट संस्कृति के खिलाफ थी।

संघ पर छह किताबें लिखने वाले रतन शारदा के अनुसार संघ के कार्यकर्ताओं को भाजपा की खातिर काम करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं, जिनकी रुचि है, सिर्फ वही भाजपा के पक्ष में प्रचार करने जाते हैं। यह संबंध 1951 से है, जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पार्टी को मजबूत करने के लिए संघ की मदद मांगी थी। संघ और भाजपा की कुछ बातें मिलती-जुलती हैं, पर यह कहना ठीक नहीं कि दोनों 100 फीसदी मिलते-जुलते हैं।

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मीडिया की वजह से चर्चा अधिक

रतन शारदा के अनुसार चुनाव में संघ के हस्तक्षेप की इतनी चर्चा इसलिए है, क्योंकि मीडिया का फोकस उत्तर प्रदेश है। वे कहते हैं, अटल बिहारी वाजपेयी आडवाणी की तुलना में नरम थे, आडवाणी मोदी की तुलना में नरम हैं और मोदी योगी के मुकाबले नरम हैं। मीडिया इस तरह के समीकरण पसंद करता है। जब के.एस. सुदर्शन संघ प्रमुख थे, तब अटल जी के साथ उनका टकराव सुर्खियां बनता था। दिल्ली में जब दोनों नेता मिले, तब उनके मतभेद की गलत खबरें फैलाई गईं। शारदा मानते हैं कि एक बड़ी लाबी है, जो योगी से डरी हुई है। संभवत: उनके भगवा कपड़ों के कारण। यही लॉबी उन्हें हटाने के लिए कहानियां गढ़ती रहती है। पहले वे लोग मोदी के पीछे थे, अब योगी के पीछे हैं। यह जरूर है कि उनका मुख्य लक्ष्य अब भी मोदी ही हैं। शारदा इस बात को अनुचित मानते हैं कि कांग्रेस शासित राजस्थान या महाराष्ट्र के महाविकास आघाडी गठबंधन के बारे में कोई नहीं लिखता। वे कहते हैं, कोविड-19 प्रभावितों की मदद के लिए संघ निरंतर कार्य कर रहा है, लेकिन उनके बारे में शायद ही कहीं कोई चर्चा होती है, यह बड़ा अटपटा-सा लगता है।

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यह नफरत हिदुत्व की देन है : ओवैसी

मुसलमानों के संबंध में संघ प्रमुख द्बारा दिए गए बयान के बाद एआइएमआइएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी ट्वीट किया है, अपने ट्वीट में ओवैसी ने लिखा है, संघ प्रमुख ने कहा कि लिचिग करने वाले हिंदुत्व विरोधी हैं। इन अपराधियों को गाय और भैंस में फर्क नहीं पता होगा, लेकिन कत्ल करने के लिए जुनैद, अखलाक, पहलू, रकबर के नाम ही काफी थे। यह नफरत हिंदुत्व की देन है, इन मुजरिमों को हिंदुत्ववादी सरकार की पुश्तपनाही हासिल है।

क्या अब थम जाएगी गैंगवार ?

देवानंद सिंह 

झारखंड के जमशेदपुर में कभी अखिलेश सिंह गिरोह का सदस्य रहा और वर्तमान में अपना गैंग चला रहे बक्सर के गैंगस्टर सुधीर दूबे को आखिरकार दबोच ही लिया गया। उसे पंजाब मेंं गिरफ्तार किया गया। झारखंड और पंजाब पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में संगरूर के एक होटल से उसे दबोचा गया। सुधीर दूबे पर हत्या, रंगदारी, आर्म्स एक्ट के तहत कई मामले दर्ज हैं। उसको आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई गई है, हालांकि बाद में उसे जमानत मिल गई थी। उसकी गिरफ्तारी से पहले झारखंड पुलिस को उसके पंजाब के संगरूर स्थित एक होटल में ठहरने की जानकारी मिली थी। इसके बाद पंजाब पुलिस के सहयोग से गत सप्ताह गुरुवार रात करीब एक बजे होटल की घेराबंदी कर उसे दबोच लिया गया। उसकी गिरफ्तारी तब हुई, जब वह खाना खाने के बाद होटल में आराम कर रहा था। उसकी गिरफ्तारी के बाद झारखंड पुलिस ने राहत की सांस ली है, क्योंकि उसके पकड़े जाने से गैंगवार थमने के आसार नजर आने लगे हैं।    



                                                                                                                                                                अप्रैल 2020  में हुई मुठभेड़ के बाद से था फरार

29 अप्रैल 2020 को अखिलेश गिरोह के साथ हुई मुठभेड़ के बाद से गैंगस्टर सुधीर फरार चल रहा था। दरअसल, मामला कुछ यूं था कि 29 अप्रैल 2020 को जमशेदपुर के सीतारामडेरा स्थित नीति बाग कॉलोनी गेट पर अखिलेश गिरोह के करीब 40 से अधिक अपराधी सुधीर दूबे के भाई पर हमला करने पहुंचे थे। इस पर सुधीर दूबे गैंग ने भी जवाबी कार्रवाई की थी। दोनों से तरफ से हुई गोलीबारी में अखिलेश सिंह गिरोह के शार्प शूटर कन्हैया सिंह, सचिन, विक्रम, सोमनाथ, अंशु चौहान, राजकुमार और सोनू घायल हो गए थे। बताया जाता है कि सुधीर दूबे गैंग ने कार्बाइन से हमला किया था। इस मामले में 13 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था। उनमें से कुछ को गिरफ्तार कर लिया गया और कुछ ने आत्मसमर्पण किया था। उस मुठभेड़ के बाद सुधीर दूबे लगातार फरार चल रहा था।



जमशेदपुर में बोलती है तूती

सुधीर ने गैंगस्टर अखिलेश सिंह के गैंग में रहते ही बदमाशी शुरू की थी। बदमाशी के लगभग सारे गुर उसने इसी गैंग से सीखे थे। हालांकि, बाद में अपना गैंग बना लिया, इसीलिए जाहिर सी बात कि दोनों के बीच दुश्मनी हो गई। जी हां, कभी एक दांत की रोटी खाने वाले अखिलेश और सुधीर एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए। सुधीर अखिलेश गैंग में मुख्य शूटर के रूप में काम करता था, लेकिन जब से उसने अपना गैंग शुरू किया तो वह बहुत कम समय में ही अपराध की दुनिया का बेताज बादशाह बन गया। आलम यह था कि जमशेदपुर जैसे शहर में भी उसकी तूती सिर चढ़कर बोलती है।




राजनीतिक संरक्षण है प्राप्त

बदमाशी और राजनीति का गहरा संबंध होता है। यह बात हर कोई जानता भी है कि गिरफ्तार फलती-फूलती है तो केवल राजनीतिक संरक्षण में ही। ऐसा ही, सुधीर के साथ भी था। राज्य के एक पूर्व मुख्यमंत्री का संरक्षण सुधीर को मिलने की बात सामने आई थी, क्योंकि उस पूर्व मुख्यमंत्री के एक पुराने अंगरक्षक का बेटा भी सुधीर गैंग का खास सदस्य है, हालांकि वतर्मान में सुधीर दूबे के ऊपर दर्जनों मामले दर्ज हैं। करीब एक दर्जन हथियार बंद शूटरों से घिरे रहने वाला सुधीर आज अकूत संपत्ति का मालिक भी हैै। पुलिस के मुताबिक पांच साल पहले सुधीर ने अपने गांव ढकाइच में बहन की शादी के दौरान ऑटोमेटिक रायफल से हजारों राउंड फायरिग की थी। जमशेदपुर जैसे लौहनगरी से सुधीर को अच्छे-खासे पैसे रंगदारी के रूप में आने लगे थे, जिससे वह लगातार अखिलेश गिरोह के सदस्यों को तोड़कर अपने गैंग में शामिल करने लगा था और देखते-ही-देखते वह आकूत संपत्ति का मालिक भी बन गया।



अपराध की दुनिया से बाहर नहीं निकलने देता था अखिलेश 

सुधीर ने कई बार अपराध की दुनिया को बॉय-बॉय करना चाहा, लेकिन अखिलेश इस पर हमेशा ही बाधक रहा। यह बात स्वयं सुधीर ने स्वीकार की। भुंइयाडीह गैंगवार के मामले में नामजद सुधीर दुबे को सीमारामडेरा पुलिस ने तीन दिन की रिमांड पर लिया था। रिमांड पूरी होने के बाद उसे कोर्ट में पेश किया गया। फिर से उसे न्यायायिक हिरासत में भेज दिया गया है। उसने बताया कि अखिलेश ने ही जमशेदपुर में उससे अपराध को अंजाम दिलाया गया, जिसकी वजह से वह काफी समय तक जेलों में रहा। उसने यह भी बताया कि इस बीच कभी भी अखिलेश सिंह ने मदद नहीं की। वह जेल से जमानत पर रिहा हुआ। इसके बाद उसने अपराध की दुनिया छोड़ने का मन बना लिया था, लेकिन अखिलेश नहीं चाहता था कि वह अपराध की दुनिया से हटे। बता दें कि अखिलेश सिंह इस समय दुमका जेल में बंद है। सुधीर ने यह भी कहा कि अखिलेश से उसकी अदावत कन्हैया सिंह और हरीश के कारण हुई और भुइयांडीह गैंगवार की घटना भी कन्हैया सिंह और हरीश सिंह के कारण ही हुई, जबकि भुइयांडीह गैंग की घटना कन्हैया सिंह के कारण हुई। उसने बताया कि सोशल मीडिया पर उसके और अखिलेश गिरोह के गुर्गों के बीच एक-दूसरे के खिलाफ कमेंट्स लिखे जा रहे थे, जिसे लेकर भुइयांडीह में गैंगवार हुई। फिलहाल, सुधीर पर 22 आपराधिक मामले दर्ज हैं। 

अखिलेश नहीं करता था रूपयों का बंटवारा 

अपराधी अखिलेश गैंग में रहने के दौरान सुधीर दुबे को यह पता चल गया था कि पैसे कहां-कहां से मिलते हैं। सुधीर ने बताया कि पैसे तो आते थे पर किसी को दिए नहीं जाते थे। इसी वजह से रूपयों के बंटवारे को लेकर भी विवाद हुआ। इस कारण उसने सोनारी निवासी अमित राय की हत्या के मामले में जमानत मिलने से पहले ही गिरोह छोड़ दिया था। इसके बाद कदमा के भानू मांझी समेत कई लोग उसके साथ थे। कई मामलों में वह शामिल नहीं था, बावजूद उसका नाम लेकर लोगों को डराया-धमकाया गया, जबकि वह नहीं चाहता था कि अपराध की दुनिया में रहे। 

बक्सर के ही रहने वाले हैं सुधीर और अखिलेश 

कभी एक साथ अपनी बदमाशी से लोगों के बीच दहशत फैलाने वाले दोनों बदमाश सुधीर और अखिलेश बक्सर जिले के ही रहने वाले हैं। सुधीर दूबे मूलरूप से बक्सर जिले के कृष्णाब्रह्म थाने के दिया-ढकाइच का रहने वाला है, जबकि सुधीर दूबे गैंग का प्रतिद्बंदी अखिलेश सिंह भी मूलरूप से बक्सर जिले के सिमरी थाना के नगवा गांव का रहने वाला है। पुलिस ने सुधीर को सबसे पहले 24 दिसंबर 2016 को जमशेदपुर के सोनारी निवासी अमित राय की हत्या के मामले में भोजपुर जिले के शाहपुर से गिरफ्तार किया था, हालांकि उस समय उसकी एनकाउंटर की अफवाह उड़ी थी। बाद में, सुधीर को झारखंड पुलिस अपने साथ लेकर चली गई। 17 अक्टूबर 2019 को हजारीबाग जेल से वह जमानत पर रिहा हुआ था। अमित राय की हत्या में उसे उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। इसमें अपील के आधार पर फिलहाल वो जमानत पर था, लेकिन पिछले साल जमशेदपुर में गैंगवार की घटना के बाद वो फरार हो गया, जिसके बाद से न केवल वह पुलिस के लिए सरदर्द बना हुआ था, बल्कि क्षेत्र में गैंगवार होने की आशंका भी बनी हुई थी, क्योंकि इसकी लोगों में काफी दशहत बनी हुई थी। सुधीर के खिलाफ रिटायर्ड जज आरपी रवि पर साकची जेल चौक पर फायरिंग, अमित राय पर साकची में फायरिंग, सोनारी में हत्या समेत दर्जनों मामले दर्ज हैं। लोगों को भी उम्मीद थी कि पुलिस जल्द-से-जल्द उसे गिरफ्तार कर लेगी, पर ऐसा ही हुआ। उसके पुलिस गिरफ्त में आने से न केवल पुलिस ने राहत की सांस ली है, जबकि लोगों को भी काफी राहत मिली है। उम्मीद है कि अब यहां होने वाली गैंगवार की घटनाओं में कमी आएगी।


बहरहाल सुधीर दुबे का पकड़ा जाना और अखिलेश सिंह का दुमका जेल में होना शहर के लिए सुखद संकेत है वहीं जिला पुलिस के लिए बड़ी कामयाबी भी जमशेदपुर पुलिस पिछले कुछ दिनों से नशा के तस्कर और नशेड़ियों          के ऊपर शिकंजा कसने के साथ-साथ संगठित अपराध पर काबू पाने के लिए जो मुहिम चलाई है उसमें बहुत हद तक सफलता मिली है देखना है कि यह सफलता कब तक जिला पुलिस बरकरार रख पाती है


Thursday, 8 July 2021

संंतुलन बनाने की भरपूर कोशिश

 कैबिनेट विस्तार…………………….

देवानंद सिंह

बहुप्रतीक्षित मोदी कैबिनेट का आखिरकार विस्तार हो ही गया है। इस कैबिनेट विस्तार में कुल 43 मंत्रियों ने शपथ ली, जिनमें 15 कैबिनेट और 28 राज्यमंत्री शामिल रहे। अब कुल मिलाकर मोदी सरकार के मंत्रियों की संख्या 77 हो गई है। कैबिनेट विस्तार के साथ कई दिग्गजों की छुट्टी हो जाना भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा को विषय बना हुआ है, क्योंकि जिन मंत्रियों की छुट्टी की गई है, उनमें ऐसे-ऐसे नाम शामिल हैं, जो मोदी सरकार की रीढ़ हुआ करते थे, इनमें केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन, शिक्षा मंत्री रमेश निशंक पोखरियाल जैसे नाम भी शामिल हैं। फिलहाल, 12 मंत्रियों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। वहीं, नई कैबिनेट में 36 नए चेहरों को जगह दी गई है और 7 मंत्रियों का प्रमोशन कर उन्हें कैबिनेट रैंक दिया गया है। सबसे बड़ी बात यह है कि कैबिनेट में 7 महिलाओं को भी जगह दी गई है। कुल मिलाकर मोदी सरकार की यह कैबिनेट चुनाव, जातीय, क्षेत्रीय, गठबंधन धर्म, युवाओं और महिलाओं का संतुलन बनाए रखने की एक ऐसी कोशिश है, जो आगामी विधानसभा चुनावों के साथ-साथ 2024 में होने वाले लोकसभा चुनावों को साध सके। मोदी ने कम आयु के मंत्रियों को अपनी नई टीम में शामिल कर कैबिनेट की औसत उम्र भी कम करने की भी पूरी कोशिश की है। मंत्रिपरिषद विस्तार के बाद अब टीम मोदी की औसत उम्र 58 साल हो गई है। यानि इस कैबिनेट में युवाओं को भरपूर मौका दिया गया है।



अगर, युवा जोश की बात करें तो मोदी मंत्रिपरिषद में शामिल नए 36 मंत्रियों में 8 ऐसे हैं, जिनकी उम्र 50 साल से कम है। पश्चिम बंगाल के कूचबिहार से पहली बार सांसद बने निशिथ प्रमाणिक सबसे कम उम्र के मंत्री हैं। उनकी उम्र महज 35 साल है। वहीं, बंगाल के ही बनगांव से पहली बार सांसद बने शांतनु ठाकुर की उम्र 38 साल है। वह बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान पीएम मोदी के बांग्लादेश दौरे पर उनके साथ गए थे। इनके अलावा ज्योतिरादित्य सिधिया (50), अश्विनी वैष्णव (50), अनुप्रिया पटेल (40), भभारती प्रवीण पवार (42), जान बरला (45) और एल. मुरुगन (44) की उम्र 50 साल या उससे कम है। मंत्री परिषद् विस्तार हो और चुनावी राज्यों को तरजीह न मिले, ऐसा कैसे हो सकता है। इसीलिए मंत्रिपरिषद विस्तार में चुनावी राज्यों का खास ख्याल रखा गया है। इन राज्यों में देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, मणिपुर और गोवा शामिल हैं, इन सभी राज्यों में अगले साल चुनाव होने हैं। बड़ा राज्य होने की वजह से यूपी को विशेष तरजीह दी गई। इसीलिए इस राज्य से मंत्रिपरिषद विस्तार में सबसे ज्यादा 7 नए चेहरों को शामिल किया गया है। इनमें महाराजगंज से सांसद पंकज चौधरी, मोहनलालगंज से सांसद कौशल किशोर, आगरा से एमपी एसपी सिह बघेल, खीरी से सांसद अजय मिश्र, पूर्व सीएम कल्याण सिंह के खास और राज्यसभा सांसद बीएल वर्मा और जालौन से सांसद भानु प्रताप वर्मा को कैबिनेट में जगह दी गई है। वहीं, बीजेपी के सहयोगी अपना दल (एस) की प्रमुख और मिर्जापुर से सांसद



 अनुप्रिया पटेल को भी मोदी ने अपने कैबिनेट में शामिल किया है। अगर, पंजाब की बात करें तो यहां से मंत्रिपरिषद में भले ही कोई नया चेहरा शामिल नहीं किया गया है, लेकिन पहले से मंत्रीपरिषद् में शामिल हरदीप पुरी का प्रमोशन जरूर किया गया है। वहीं, उत्तराखंड से शिक्षामंत्री रहे रमेश पोखरियाल निशंक को हटाकर राज्य से अजय भट्ट को कैबिनेट में जगह दी गई है। मणिपुर में भी अगले साल चुनाव है, इसीलिए वहां से राजकुमार रंजन सिह को मंत्रिपरिषद में शामिल कर वहां के स्थानीय सियासी गणित को साधने की पूरी कोशिश की गई है। वहीं, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और कर्नाटक से 4-4 नए मंत्री बनाए गए हैं, जबकि गुजरात से 3 और मंत्रियों को जगह मिली है। महाराष्ट्र में भी बीजेपी शिवसेना से अलग होने के बाद अपनी ताकत बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। वहीं, यही स्थिति दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक को लेकर भी है, इसीलिए नई कैबिनेट में इसका भी विशेष ध्यान रखा गया है।



मोदी ने नए कैबिनेट विस्तार में सहयोगियों को खुश करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है। राम विलास पासवान के निधन के बाद मोदी मंत्रिपरिषद में सिर्फ रामदास आठवले ही गैर-बीजेपी मंत्री थे, लेकिन मंत्रिपरिषद् विस्तार में कई और नए सहयोगियों को जगह दी गई है। जेडीयू से आरसीपी सिह, एलजेपी के बागी गुट के पशुपति पारस और यूपी में अपना दल (एस) की अनुप्रिया पटेल इन नए चेहरों में शामिल हैं। कुल मिलाकर नई कैबिनेट को ‘एनडीए कैबिनेट’ का रूप देने की पूरी कोशिश की गई है। मंत्रीपरिषद् विस्तार में जो एक और बात शामिल है, वह है क्षेत्रीय संतुलन बनाने की कोशिश, इसीलिए मंत्रीपरिषद् में देश के हर हिस्से को जगह देने की कोशिश की गई है। चाहे उनमें हिंदी भाषी क्षेत्र हों या फिर पूर्वोत्तर, पश्चिम से लेकर पूर्वी और दक्षिण भारत हो। सभी क्षेत्रों को प्रतिनिधित्व देने की भरपूर कोशिश की गई है। दक्षिण में कर्नाटक के 4 मंत्रियों के अलावा तमिलनाडु से एल. मुरुगन को भी मंत्री बनाया गया है, जबकि मुरुगन संसद के किसी भी सदन के सदस्य नहीं हैं। माना जा रहा है कि उन्हें थावर चंद गहलोत के इस्तीफे के बाद खाली हुई सीट पर बाकी के कार्यकाल के लिए राज्यसभा भेजा जा सकता है। बता दें कि गहलोत का राज्यसभा का कार्यकाल आगामी 2024 तक था।

मंत्रिपरिषद् विस्तार में शामिल किए गए नए चेहरों को लेकर जितनी चर्चा हो रही है, उतनी चर्चा उन मंत्रियों को लेकर भी हो रही है, जिनका प्रमोशन किया गया है और जिनकी मोदी कैबिनेट से छुट्टी की गई है। जिन मंत्रियों की छुट्टी की गई है, उनमें कई बड़े नाम शामिल हैं। इनमें मुख्य रूप से केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्द्घन, सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाा जावड़ेकर, शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक जैसे नाम भी शामिल हैं।


नई कैबिनेट में शपथ लेने वाले मंत्री


मोदी की नई कैबिनेट विस्तार में जिन मंत्रियों ने शपथ ली है, उसमें वरिष्ठता के क्रम में नारायण राणे, सर्बानंद सोनोवाल, विरेंद्र कुमार, ज्योतिरादित्य सिधिया, रामचंद्र प्रसाद सिह (आरसीपी सिह, जेडीयू), अश्विनी वैश्नव, पशुपति पारस (एलजेपी), किरण रिजीजू, राज कुमार सिह, हरदीप पुरी, मनसुख मंडाविया, भूपेंद्र यादव, पुरुषोत्तम रुपाला, जी किशन रेड्डी, अनुराग सिह ठाकुर, पंकज चौधरी, अनुप्रिया पटेल (अपना दल), सत्यपाल सिह बघेल, राजीव चंद्रशेखर, शोभा करणडालजे, भानू प्रताप सिंह वर्मा, दर्शन विक्रम, मीनाक्षी लेखी, अनुपपूर्णा देवी, ए. नारायणसामी, कौशल किशोर, अजय भट्ट, बीएल वर्मा, अजय कुमार, देव सिंह चौहान, भगवंथ खूबा, कपिल पाटिल, प्रतिमा भौमिक, सुभाष सरकार, भागवत कराद, राज कुमार रंजन सिह, भारती प्रवीण पवार, विशेश्वर टूडू, शांतुन ठाकुर, मुंजापारा महेंद्र भाई, जॉन बराला, एल मुर्गुन व निशित प्रमाणिक शामिल हैं। इसी सूची में जिन मंत्रियों को प्रमोशन दिया गया है, उनमें पुरुषोत्तम रुपाला, अनुराग ठाकुर, मनसुख मंडाविया, आरके सिंह, हरदीप सिंह पुरी, जी किशन रेड्डी और किरेन रिजिजू शामिल हैं।


वहीं, जिन दिग्गजों को मोदी कैबिनेट से छुट्टी दी गई है, इनमें केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, सूचना प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर, स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन, केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्री डी वी सदानंद गौड़ा, श्रम मंत्री संतोष गंगवार, शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक, शिक्षा राज्य मंत्री संजय धोत्रे, वन और पर्यावरण राज्य मंत्री बाबुल सुप्रियो, राव साहब दानवे, रतन लाल कटारिया, प्रताप सारंगी और देव श्री बैनर्जी जैसे नाम शामिल हैं। वहीं, गृह, रक्षा, वित्त जैसे बड़े मंत्रालयों के साथ प्रधानमंत्री ने कोई छेड़छाड़ नहीं है। अब, देखना होगा कि आगामी दिनों में मोदी की नई टीम को लेकर जनता और विरोधियों की तरफ से क्या रिएक्शन आता है।

क्या पंजाब कांग्रेस की गुटबाजी के बीच टिक पाएंगे चरणजीत सिंह चन्नी ?

देवानंद सिंह चरणजीत सिंह चन्नी ने पंजाब के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले ली है। जितने आश्चर्यजनक तरीके से उनका नाम सामने आया, उतना ही आश्...