Friday, 15 April 2022

अनर्गल मुद्दों को उठाने बजाय क्षेत्र के विकास पर ध्यान दें सरयू राय

देवानंद सिंह

विधायक सरयू राय द्बारा स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता पर कोविडकाल में अवैध तरीके से अपने 60 लोगों को प्रोत्साहन राशि का वितरण के आरोपों के बाद झारखंड की राजनीति में एक बार सियासी गरमाहट आ गई है। सरयू राय ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर इस तरह का आरोप लगाया था, जिसके बाद स्वास्थ्य मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए वो सारे आकड़े सार्वजनिक किए हैं, जिसके तहत प्रोत्साहन राशि का वितरण किया गया। वहीं, स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता ने भी अपने बयान में सीधे तौर पर सरयू राय को चुनौती देते




 हुए कहा है कि उन्हें पत्र लिखने का क्या जरूरत थी, कोर्ट और एजेंसियों का दरवाजा खुला है। जांच कराई जाए, दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। कुल मिलाकर, देखा जाए तो सरयू राय द्बारा लगाया गया आरोप यह कोई नई बात नहीं है। पिछले ढ़ाई के साल के दौरान उन्होंने काम कम और द्बेषपूर्ण तरीके से दूसरे नेताओं को कटघरे में खड़े करने की कोशिश की है, जो किसी भी रूप में जायज नहीं है। इससे पहले वह राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के दिग्गज नेता रघुवर दास के खिलाफ अनावश्यक बयानबाजी देते रहे। उनके खिलाफ बेवजह मोर्चा खोला रखा। यानि जब से वह निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव जीतकर आए हैं, उनका ध्यान विकास के मुद्दों पर कम और रघुवर दास पर ज्यादा केंद्रित रहा। अब लगता है, जिस तरीके से अब वह स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता को टारगेट कर रहे हैं, उससे लगता है कि अब आने वाला ढ़ाई साल उनका इसमें बीतने वाला है। लेकिन इस बीच सबसे बड़ा सवाल है कि जिन मुद्दों को लेकर वह चुनाव जीतकर आए हैं, उनका क्या हुआ ? समाज से जुड़े ऐसे बहुत से मुद्दे थे, जिनको उन्होंने चुनाव जीतने के लिए मुद्दा बनाया था, लेकिन पिछले ढ़ाई साल में वह विकास की राजनीति के बजाय टारगेटेट राजनीति को ही आगे बढ़ाते रहे हैं। जब राज्य में विकास के मुद्दों को लेकर बात होनी चाहिए, तब इस तरह के अनर्गल मुद्दों को उठाकर क्या होगा, केवल जनता का ही नुकसान होगा। दूसरा, कोविडकाल में जिस तरह स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता सक्रिय रहे, उसने राज्य में कोरोना को फैलने से रोकने में अहम भूमिका निभाई। वह दिन-रात कोविड से जुड़ी सुविधाओं की मॉनिटरिंग कर रहे थे। खुद भी कोरोना पीड़ित हुए। एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार। जब कोरोनाकाल में स्वास्थ्य मंत्री, स्वास्थ्य कर्मियों और दूसरे लोगों द्बारा किए गए अथक कार्यों की सराहना होनी चाहिए, तब इस तरह के आरोप लगाना बिल्कुल भी अनुचित है। अनुचित ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य कर्मियों का भी अपमान है। लिहाजा, जनता इस बात को भली-भांति देख रही है कि आखिर काम कौन कर रहा है और कौन अनर्गल के मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है। जब सरयू राय को यह देखने की जरूरत है कि उनके क्षेत्र में कितना काम हुआ है और वह किन मुद्दों को लेकर विधायक बने हैं, बेमतलब वह पहले रघुवर दास और अब स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता को बदनाम करने में लगे हुए हैं। उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि अनावश्यक मुद्दों को उठाकर वह भविष्य में चुनाव जीतने वाले नहीं हैं, बल्कि उन्हें भी अपने कार्यों का हिसाब देना होगा, क्योंकि चुनाव के दौरान जनता उनसे भी सवाल पूछेगी कि आखिर आपने पांच साल में किया क्या ? लोगों की उन समस्याओं का निस्तारण क्यों नहीं किया ? जिसको लेकर वह निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जनता के बीच में गए थे। इसीलिए इस पूरे मामले का निष्कर्ष यही निकलता है कि सरयू राय को पत्र लिखने के बजाय कोर्ट या फिर जांच एजेंसियों का दरवाजा खटखटाना चाहिए था, तभी तथ्य सामने आते। स्वास्थ्य मंत्रालय ने जब तथ्य सार्वजनिक कर दिए हैं तो वह अपने आरोपों को किस तरह सिद्ध कर पाएंगे, जनता तो अब यह कहने लगी है की ढाई साल पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास के पीछे लगे रहे और ढाई साल स्वास्थ्य मंत्री बन्ना गुप्ता के पीछे लगे रहेंगे मालिकाना हक का मुद्दा कहां गया इस पर भी उन्हें विचार करना चाहिए। आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों को सिद्ध भी करना चाहिए। इसीलिए मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर सरकार के अंदर फूट डलवाने का प्रयास करने के बजाय सरयू राय के लिए बेहतर होता कि वह कोर्ट की शरण में जाते, तभी कोई रिजल्ट निकल पाता। जब स्वास्थ्य मंत्रालय सारी चीजें स्पष्ट कर चुका है तो अब सरयू राय के लिए ज्यादा जरूरी होना चाहिए, क्षेत्र के विकास पर ध्यान देना, तभी जनता उन्हें माफ करेगी।

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