Tuesday, 13 July 2021

संघ का चुनावी स्टंट

देवानंद सिंह 

पश्चिम बंगाल में चुनाव हारने व कोविड-19 महामारी के बाद गिरते ग्रॉफ को देखते हुए भाजपा को उत्तर-प्रदेश  सहित कई राज्यों में होने वाले चुनावों की चिंता सताने लगी है, इसी वजह से संघ भी चुनावी गियर में नजर में आने लगा है। बहुत-सी ऐसी परिस्थितियां नजर आ रही हैं, जिसमें संघ आगे बढ़कर न केवल चीजों को मैनेज करने में जुटा है, बल्कि पार्टी के अंदर भी सामंजस्य बनाने की कोशिश कर रहा है, जिससे अगले साल होने वाले चुनावी रण में बाजी मारी जा सके। उत्तर-प्रदेश पर विशेष फोकस किया जा रहा है, क्योंकि उत्तर-प्रदेश के रास्ते ही 2024 में दिल्ली का रण फतह होना है, इसीलिए पिछले कुछ दिनों से उत्तर-प्रदेश में संघ की सक्रियता खूब देखी जा रही है वह इसी का नतीजा था। इसके बाद जो एक और महत्वपूर्ण बात है, वह है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत का बयान, जिसमें उन्होंने कहा है कि भारत में इस्लाम को कोई खतरा नहीं है। इसीलिए मुसलमानों को ऐसेे किसी डर में नहीं रहना चाहिए। सभी भारतीयों का डीएनए एक है। उन्होंने लिंचिंग की भी निंदा की और कहा कि ऐसा करने वाले हिंदुत्व के खिलाफ हैं। 



अभी संघ प्रमुख ने यह बात क्यों की, इसे समझना बहुत अधिक मुश्किल नहीं है। यूपी का राजनीतिक गणित जातीय समीकरणों से बंधा हुआ है, इसीलिए चुनावों में इसकी विशेष भूमिका होती है। इसमें मुस्लिम भी शामिल हैं, क्योंकि प्रदेश में लगभग 18 फीसदी मुस्लिम वोटर हैं, जो चुनाव का परिणाम बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मोहन भागवत के बयान से साफ जाहिर होता है कि उन्होंने अपने बयान से मुस्लिम वोटरों को साधने का सीधा प्रयास किया है। हाल ही में, प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी एआइएमआइएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी को बड़ा नेता बताकर कुछ ऐसा ही प्रयास किया था। चलो मान लेते हैं कि योगी आदित्यनाथ राजनीतिक धारा से जुड़े हुए हैं, लेकिन संघ प्रमुख ने ऐसा क्यों किया ? जबकि वह स्वयं को सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन मानता है। संघ का यह पहला ऐसा स्टंट नहीं है। पहले भी जब-जब ऐसी परिस्थितियां पैदा हुईं हैं, संघ आगे आता रहा है। आगामी 2024 तक का सफर राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होने वाला है, इसीलिए यूपी और केंद्र में सरकार बनाने के मिान में संघ पीछे कैसे रह सकता है। 

दरअसल, इसके पीछे की कहानी यह भी कि संघ की 2025 में शताब्दी महोत्सव आयोजित करने की योजना है। जाहिर सी बात है कि इससे पहले ही केंद्र में कोई भी नई सरकार बन जाएगी। यानि भाजना सत्ता में आती है तो इसके मायने कुछ अलग होंगे। हम यह भी कह सकते हैं कि 2025 में होने वाले शताब्दी महोत्सव की सफलता ही इस बात पर निर्भर करेगी कि केंद्र में भाजपा की सरकार है या नहीं। वर्तमान में जो हालात हैं, उस परिस्थिति में भाजपा के प्रति लोगों में थोड़ा रोष है, खासकर, कोरोना को नियंत्रित करने में सरकार जनता के उम्मीदों के अनुरूप काम नहीं कर पाई, इसीलिए संघ ने अपनी भूमिका को थोड़ा बढ़ा दिया है, इसीलिए हम सबने देखा कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में संघ के पदाधिकारी जमीनी स्तर पर काम करते नजर आ रहे थे। अब अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर भी संघ पदाधिकारियों की सक्रियता बढ़ गई है। भाजपा नेता कहते भी हैं कि उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं। यह भाजपा और पूरे संघ परिवार के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। लिहाजा, विधानसभा चुनाव के नतीजों से 2024 के चुनावों की तस्वीर साफ होगी, इसीलिए संघ यहां कोई भी चूक नहीं करना चाहता है। उधर, योगी आदित्यनाथ के खिलाफ जो माहौल बनाया जा रहा था, वह पंचायत चुनावों में बीजेपी  प्रतियाशियों की प्रचंड जीत से कम हुआ है। भाजपा और संघ के लिए यह अच्छी खबर है कि जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में उसे 75 में से 67 में जीत मिली है। प्रमुख विपक्षी दल समाजवादी पार्टी के खाते में सिर्फ पांच सीटें आई हैं। वहीं, राष्ट्रीय लोकदल को एक सीट पर जीत मिली है। भाजपा की सफलता इसीलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसने समाजवादी पार्टी को उनके गढ़ मैनपुरी, रामपुर, बदायूं और आजमगढ़ में भी शिकस्त दी है। हालांकि, यह माना जा रहा है कि बसपा समर्थकों ने इन चुनावों में भाजपा के पक्ष में वोट दिया। इसके बावजूद भी, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली के खिलाफ असंतोष की आवाज है। आरोप है कि पार्टी के विधायकों और मंत्रियों से ज्यादा वे अधिकारियों पर भरोसा करते हैं, ठाकुरों को ज्यादा तरजीह मिलती है, जबकि अन्य किनारे कर दिए गए हैं। कोरोना महामारी से निपटने के उनके तरीके की आलोचना के साथ असंतोष की आवाजें तेज हुईं। लिहाजा, भाजपा नेताओं के साथ कई बैठकों में संघ के पदाधिकारियों ने उन्हें दूसरे राज्यों में असंतोष दूर करने की सलाह दी और उत्तर प्रदेश में खुद हालात से निपटने का निर्णय लिया। इसीलिए पिछले दिनों उत्तर-प्रदेश में संघ नेताओं के दौरे होते रहे हैं।

जहां तक दूसरे राज्यों की बात है संघ की पृष्ठभूमि वाले भाजपा महासचिव अरुण सिंह को मुख्यमंत्री बी.एस. येदियुरप्पा के समर्थन में कर्नाटक भेजा गया। वहीं, गुजरात में जहां पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सी.आर. पाटील और मुख्यमंत्री विजय रुपाणी आमने-सामने हैं, वहां असंतुष्ट विधायकों के साथ भाजपा के शीर्ष नेताओं ने बात की। मध्य प्रदेश और हिमाचल प्रदेश में भी नेतृत्व परिवर्तन की चर्चा के बीच भाजपा केंद्रीय नेतृत्व ने स्थिति को संभाला, उससे पहले केंद्रीय नेतृत्व ने त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लव कुमार देब के खिलाफ असंतोष को दबाया, हालांकि उत्तराखंड में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिह रावत को हटाने का फैसला लेना पड़ा। 

कुल मिलाकर संघ की नजर इन राज्यों पर भी है, और उत्तर प्रदेश पर भी। पर मुख्य फोकस तो उत्तर- प्रदेश पर ही है। भाजपा और संघ के शीर्ष नेतृत्व ने 23 मई को राज्य की स्थिति का जायजा लिया और महामारी की दूसरी लहर के असर की समीक्षा की। उस बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा, संघ के सर कार्यवाह दत्तात्रेय होसबले और भाजपा के प्रदेश संगठन सचिव सुनील बंसल भी मौजूद थे। संघ में नंबर दो की हैसियत रखने वाले होसबले 24 से 28 मई तक उत्तर-प्रदेश में ही थे, जहां उन्होंने राज्यस्तरीय पदाधिकारियों के साथ विचार-विमर्श किया और योगी सरकार के प्रति फीडबैक लिया। ऐसी ही, एक बैठक में मौजूद रहने वाले संघ के एक नेता के अनुसार, कोविड-19 के कारण योगी सरकार की छवि को हुए नुकसान को लेकर वे काफी चितित थे। उन्होंने गंगा तट पर दफनाई गई और पवित्र नदी में बहाई गई लाशों के बारे में भी जानकारी ली।

बताया जा रहा है कि उसके बाद भी होसबले दो और बैठकें कर चुके हैं। प्रदेश भाजपा इकाई को यह संदेश गया है कि विधानसभा चुनाव योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में ही लड़ा जाएगा। संघ के उक्त पदाधिकारी ने बताया कि योगी हिदुत्व की मजबूत छवि वाले नेता हैं। सीएए विरोधियों, लव जिहाद कानून और अवैध बूचड़खाने बंद करने जैसे मुद्दों पर उनका रवैया संघ की विचारधारा के अनुरूप ही है। संघ नेता यह भी जानते हैं कि 2024 के चुनाव से पहले अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पूरा करने के लिए योगी ही सबसे योग्य व्यक्ति हैं। लिहाजा, संघ ने योगी और उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के बीच मध्यस्थ की भी भूमिका निभाई। मौर्य चाहते थे कि 20 22 के चुनाव में योगी को मुख्यमंत्री पद का दावेदार न बनाया जाए। होसबले, भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव (संगठन) बी.एल. संतोष और कृष्ण गोपाल समेत कई नेता योगी के साथ मौर्य के घर भोजन के लिए पहुंचे। संघ के एक वरिष्ठ पदाधिकारी के अनुसार, मतभेद दूर करने के लिए संघ सहभभोज और बैठक जैसी रणनीतियां अपनाता है। झारखंड, छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल में पराजित होने के बाद वह यहां मौका नहीं गंवाना चाहता है।

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सक्रियता को असामान्य घटना मानते हैं संघ नेता

संघ की पृष्ठभूमि वाले एक वरिष्ठ भाजपा नेता के अनुसार यह कहना गलत होगा कि संघ उत्तर प्रदेश चुनाव को ध्यान में रखते हुए यह सब कर रहा है। वे कहते हैं, संघ ऐसा कुछ भी नहीं कर रहा, जो असामान्य हो। वह तो कोविड-19 के बाद राहत कार्यों में व्यस्त है। हालांकि इस नेता ने स्वीकार किया कि बंगाल चुनाव और उससे पहले 2018 में त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में संघ की सक्रिय भूमिका थी। उन्होंने कहा कि दोनों राज्यों में संघ के लिए लड़ाई राजनैतिक नहीं, बल्कि वैचारिक थी। बंगाल में लड़ाई मुस्लिम कट्टरपंथियों के खिलाफ तो त्रिपुरा में हिसक कम्युनिस्ट संस्कृति के खिलाफ थी।

संघ पर छह किताबें लिखने वाले रतन शारदा के अनुसार संघ के कार्यकर्ताओं को भाजपा की खातिर काम करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। वे कहते हैं, जिनकी रुचि है, सिर्फ वही भाजपा के पक्ष में प्रचार करने जाते हैं। यह संबंध 1951 से है, जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने पार्टी को मजबूत करने के लिए संघ की मदद मांगी थी। संघ और भाजपा की कुछ बातें मिलती-जुलती हैं, पर यह कहना ठीक नहीं कि दोनों 100 फीसदी मिलते-जुलते हैं।

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मीडिया की वजह से चर्चा अधिक

रतन शारदा के अनुसार चुनाव में संघ के हस्तक्षेप की इतनी चर्चा इसलिए है, क्योंकि मीडिया का फोकस उत्तर प्रदेश है। वे कहते हैं, अटल बिहारी वाजपेयी आडवाणी की तुलना में नरम थे, आडवाणी मोदी की तुलना में नरम हैं और मोदी योगी के मुकाबले नरम हैं। मीडिया इस तरह के समीकरण पसंद करता है। जब के.एस. सुदर्शन संघ प्रमुख थे, तब अटल जी के साथ उनका टकराव सुर्खियां बनता था। दिल्ली में जब दोनों नेता मिले, तब उनके मतभेद की गलत खबरें फैलाई गईं। शारदा मानते हैं कि एक बड़ी लाबी है, जो योगी से डरी हुई है। संभवत: उनके भगवा कपड़ों के कारण। यही लॉबी उन्हें हटाने के लिए कहानियां गढ़ती रहती है। पहले वे लोग मोदी के पीछे थे, अब योगी के पीछे हैं। यह जरूर है कि उनका मुख्य लक्ष्य अब भी मोदी ही हैं। शारदा इस बात को अनुचित मानते हैं कि कांग्रेस शासित राजस्थान या महाराष्ट्र के महाविकास आघाडी गठबंधन के बारे में कोई नहीं लिखता। वे कहते हैं, कोविड-19 प्रभावितों की मदद के लिए संघ निरंतर कार्य कर रहा है, लेकिन उनके बारे में शायद ही कहीं कोई चर्चा होती है, यह बड़ा अटपटा-सा लगता है।

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यह नफरत हिदुत्व की देन है : ओवैसी

मुसलमानों के संबंध में संघ प्रमुख द्बारा दिए गए बयान के बाद एआइएमआइएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने भी ट्वीट किया है, अपने ट्वीट में ओवैसी ने लिखा है, संघ प्रमुख ने कहा कि लिचिग करने वाले हिंदुत्व विरोधी हैं। इन अपराधियों को गाय और भैंस में फर्क नहीं पता होगा, लेकिन कत्ल करने के लिए जुनैद, अखलाक, पहलू, रकबर के नाम ही काफी थे। यह नफरत हिंदुत्व की देन है, इन मुजरिमों को हिंदुत्ववादी सरकार की पुश्तपनाही हासिल है।

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