Wednesday, 8 September 2021

महापंचायत में दिखी किसानों की ताकत…..

देवानंद सिंह

मुज्जफरनगर में आयोजित किसान पंचायत में जिस तरह किसानों का हुजूम जुटा, वह कई मायनों में महत्वपूर्ण रहा। एक तरफ, इस आंदोलन ने किसानों को और हुंकार भरने के लिए प्रेरित किया, वहीं राजनीतिक तौर पर यह आंदोलन बीजेपी के लिए आगामी चुनाव को देखते हुए परेशानी खड़ी करने वाला साबित होता दिख रहा है। भले ही, पूरे राज्य में इसका असर न दिखे, लेकिन वेस्टर्न यूपी में असर दिख सकता है। हम सब जानते हैं कि दिल्ली का



 रास्ता उत्तर प्रदेश से होकर जाता है, इसीलिए 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले अगले साल यानि 2022 में यूपी में होने वाले विधानसभा चुनाव बहुत मायने रखते हैं। इसीलिए कृषि कानूनों व अन्य मुद्दों को लेकर चल रहा किसान आंदोलन बीजेपी सरकार की दुखती रग पर चोट करने वाला साबित हो रहा है। किसान पंचायत में आगामी 27 सितंबर को राष्ट्रव्यापी बंद की घोषणा की गई है। इसको लेकर भी व्यापक तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। जिस तरह किसान पंचायत का असर देखने को मिला, उसी तरह किसानों द्वारा किए गए देश व्यापी बंद का असर भी देखने को मिल सकता है। इसीलिए राजनीतिक पार्टियां भी इसे भुनाने में पीछे नहीं रह रहीं हैं। खासकर, बीजेपी को छोड़कर दूसरी पार्टियां। सपा और कांग्रेस तो इस मुद्दे को और हवा देना चाहती हैं, क्योंकि उन्हें भी लगता है कि अगर, चुनाव में बीजेपी को टक्कर देनी हैं तो किसान आंदोलन को जीवित रखना बहुत ही जरूरी है, इसीलिए ये पार्टियां लगातार राजनीतिक रंग देने की कोशिश कर रहीं हैं। पांच सितंबर को जब हम राष्ट्रीय राजधानी से मुज्जफरनगर के लिए निकले तो हर तरफ सड़कों पर किसान आंदोलन से जुड़े बड़े बड़े होर्डिंग लगे हुए थे और किसान बड़ी संख्या में पंचायत में भाग लेने के लिए पंचायत स्थल पर पहुंच रहे थे, जिसकी वजह से सड़कों में जाम की स्थिति देखने को मिल रही थी। पंचायत स्थल से जिस तरह किसानों ने हुंकार भरी, उसने किसानों की एकजुटता का भी परिचय दिया। किसानों ने सीधे सीधे कहा कि वे किसी भी स्थिति में पीछे नहीं हटेंगे, चाहे उन्हें जान ही क्यों न देनी पड़े। इसीलिए इस पूरे माहौल से लगता है कि जिस तरह किसान आंदोलन को राजनीतिक रंग चढ़ चुका है, वैसे में बीजेपी चुनाव के दौरान इस व्यापक विरोध को कैसे डिफेंस करेगी, यह देखना बहुत ही महत्वपूर्ण होगा।

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